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सच से साक्षात्कार।

पेड़ों में खामोश ठंड़क,  और साथ में, कलकलाती कोलाहल धारा, आसमान को जमीं करते पाइन पैरों तले जमीन के एहसास से दुर, पेड़ों पर जीवित मशरुम को खाती , काली गिलहरियां, एक दुसरे के पीछे,  पेड़ के उपर नीचे, टेढे-मेढे रास्तों पर सीधी चलती, और उस पेड़ से फ़ुदकती रोबिन, या शायद रोबिन जैसी, ठंडी खामोशी, और उसे और खामोश करती पहाड़ी बर्फ़ीली धारा, प्यार, स्रजन, और विनाश, सब यहीं मौज़द था संकेत में नहीं , सोच में, एहसास में नहीं सच में, साथ में, हाथ में (जिद्दू क्रष्णमुर्ती के शब्द, मेरी नज़र में)

नीलिमा

दो अंतहीन बादल और उनके बीच नीले आसमान का कतरा इतनी नीलिमा इतनी स्वछंद कोमल और पिघलती कुछ ही लम्हों में घुल जायेगी जैसे कभी थी ही नहीं! वो नीलिमा फ़िर कभी नज़र नहीं आयेगी क्या तुमने उससे रिश्ता नहीं जोड़ा . . .? (जिद्दू क्रष्नमूर्ती की चहलकदमी और उस दौरान आये विचारॊं का काव्यअनुवाद )

प्रकृति रिश्तों कि . . . . रिश्तॊं कि प्रकृति. . . !

इंसान ने लाखों व्हेल मछलियों को मारा है और अब भी... क्या कुछ ऐसा मिला है, जो शायद दूसरे तरीकों से हाथ नहीं आता? पर शायद ख़त्म करना मानवी शौक है हिरनों कि चपलता को, चीते कि  सपलता को ग़ज कि गर्जन को सच को, सर्जन को हमें एक दुसरे को ख़त्म करने का शौक है इस धरा पर, इंसानी इतिहास में, आज तक कोई पड़ाव नहीं जहाँ इन्सान ने मानवता को मारना ख़त्म किया हो अगर हम कर सकें और करना चाहिए, कि प्रकृति से, धरती से एक गहरा समयसिद्ध रिश्ता जोड़ें वृक्षों के ठहराव से झुरमुटों के फैलाव से फूलों के स्वार्थ से, कि दुनिया खुबसूरत करनी है तो खुद खुबसूरत बनो घाँस कि विनम्र हरियाली से बादलों कि निश्चिंत अस्थिरता से अगर हम ऐसा कर सकें, तो फिर शायद ही कोई ऐसा कारण धुंढ़ पायें, जो हमें, एक, दुसरे इन्सान को मारने के लिए बाधित-प्रेरित करें (जिददु कृष्णमूर्ति के विचारो से अनुरचित)