पेड़ों में खामोश ठंड़क, और साथ में, कलकलाती कोलाहल धारा, आसमान को जमीं करते पाइन पैरों तले जमीन के एहसास से दुर, पेड़ों पर जीवित मशरुम को खाती , काली गिलहरियां, एक दुसरे के पीछे, पेड़ के उपर नीचे, टेढे-मेढे रास्तों पर सीधी चलती, और उस पेड़ से फ़ुदकती रोबिन, या शायद रोबिन जैसी, ठंडी खामोशी, और उसे और खामोश करती पहाड़ी बर्फ़ीली धारा, प्यार, स्रजन, और विनाश, सब यहीं मौज़द था संकेत में नहीं , सोच में, एहसास में नहीं सच में, साथ में, हाथ में (जिद्दू क्रष्णमुर्ती के शब्द, मेरी नज़र में)
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।