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कचरा पुराण!

समझ में नहीं आया देखा तमाम कचरा ढेर, अंबार इंसान की लीला अपरमपार मुरख थोड़े, पहले उबकाई, फ़िर बात समझ में आयी सही-गलत, अच्छा-बुरा, छोटा-बड़ा, सफ़ेद-काला जैसे ही, गंदगी-कचरा भी सम्पूरक हैं, दीवाली है, घर की सफ़ाई लाजमी है, पर लॉ ऑफ़ कंसरवेशन ऑफ़ कचड़ा, जो मशहूर वैज्ञानिक, “पोंगा पंड़ित" की देन है, के अनुसार, कचरा खत्म नहीं कर सकते, उसकी केवल जगह बदल सकते हैं, तो लो घर साफ़, गली, मोहल्ला, शहर, गंदा बदबूदार और इरादा देखिए कितना नेक है ओह! लक्ष्मी आप! बाहर बदबू है न बहुत,  हैं हैं हैं (खीसें निपोर) आइये न, हमारे घर के दरवाज़े हमेशा खुले हैं, कुछ इंसान कितने दूध के धुले हैं मूरख में, अब समझा ये, वर्ण-व्य्वस्था का विज्ञान, छूआ-छूत का नया आयाम मन को साफ़ रखने के लिये अपने इरादों की बदबू विचारों की गंदगी, दिमाग की कीचड़, सेहत के लिये अच्छी नहीं, इसे एक वर्ण -समुदाय संभाले सब की भलाई के लिये कुछ को तो अछूता रहना ही पड़ेगा, यही विधि-विधान है, शास्त्रों का ज्ञान है गंदगी सोचने-फ़ैलाने वाला = साफ़ होगा, शाश्वत, ब्राह्मण सफ़ाई करने वाला - ...

अंदाज़-ए-आतिशबाज़ी!

इस दीवाली के पटाखों को, कोई नयी गाली हो जाये, माँ-बहन की जगह राम-लखन की विवेचना की जाये! दीवाली आने वाली है,  ये आज की गाली है, मजहबी गुंगे क्या समझें,  क्यों कोई सवाली है? सीता को पूछे कोई कि कैसे राम निकले, सब के सब  कानों के अपने हराम निकले ! अक्ल गलियों मे जल रही है,  बेशर्मी हर दौर पल रही है, गरीबी एक जुंए का खेल है,  सच्चाई जाम में ढल रही है! कस के दो-चार गाली हो जाये,  अपनी भी दीवाली हो जाये, बड़े आये मुबारक कहने,  गीली पटाखे कि थाली हो जाये! :-P एक एक पटाखा मां-बहन की गाली है, आपकी फ़ुलझड़ी किसी कि बेहाली है सारे अनार किसी के रस्तों की दीवार, दीवाली मना रहे है या दिमागी बीमार? चल रही है चारों और अतीत की हम्माली, और हम पर ये इल्ज़ाम की दीवाली पर गाली!

इस दीवाली मीठे से बचिये . . .

एक महीन से कपड़े के अंदर छूपी हैं, मिठाईयाँ और तमाम बेशरम सच्चाईयां! अगर दम है तो नये सिरे से भी सीखो, पत्थर की लकीरें, दरारें भी होती हैं! परंपरा है बस इसलिये करते हैं, दिमाग की प्रोग्रामिंग(Programming) कहां करते हैं? रॉकेट हो गये सारे सपने, उम्मीदों को सुतली बम, धूल बनी सारी रंगोली, अब आगे क्या बोलें हम! एक दीवाली है और दो आपके कान हैं, आज तो बेहरा होना वरदान है! लगे हैं स ब दिन को सुलगाने में, यूँ हो रही हैं तमाम रातें‌ रोशन! आवाज़ें ईतनी कि बहरों के कान खुल जायें, फ़िर भी आपके कानों पर जूँ नहीं रेंगती! लड़ी पटाखों की और झड़ी अहमकों कि, बदसलूकी, बदनियती के मौसम बने हैं! कहते हैं देर होती है, अंधेर नहीं,  पर रोशनी ही गंदी हो तो क्या?