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अजनबी मुल्क!

अजनबी अपने ही मुल्क में, यूँ हमसे वास्ता कर लिया? सब कट लिए अपने अपने रास्ते, क्यों हमने ये रास्ता कर लिया? हम यकायक सामने आए, उसने पतली गली को रास्ता कर लिया! घर से इतना दूर कैसे हो गए शहर ने ऐसा रिश्ता कर लिया! मजबूर हैं तो मदद मिल गई, मजदूर खस्ता हाल कर दिया! जितने थे यकीं सब टूट गए, मूरख थे सो भरोसा कर लिया! वंदे मातरम जबरन बुलवा के देश भक्त मूरख बना दिया! लाठी पुलिस की बोलती है,  इसने कब सरम कर  लिया? मेहनत बड़ी सस्ती है यहाँ, लंबा घर का रास्ता कर लिया! भूखे रहें बच्चे कि हाथ फ़ैलाएं इज्ज़त यूँ दरबदर कर दिया!  पूछते हैं के वापस आओगे? बेशर्म  शहर सवाल कर लिया! जात धरम सब याद दिलाए, सरकार ये कमाल कर दिया

अदने से सच!

ग़रीबी ने चलना शुरू किया रास्ते लुट गई, अकेली थी, बेचारी हो गई, ये कैसी हमको बीमारी हो गई? मजदूर था, घर से दूर था, फ़िर मजबूर हो गया, चलते चलते, खून सारा पानी हो गया, बिन ईद कुर्बानी हो गया! पैर छोटे थे, और रास्ते लंबे हो गए, हड्डियां बोलने लगीं, पैरों के छालों से, पिचके गालों से ये नए खेल! कमजोरी कंधे सवार हो गई, और सारी जमापूंजी, बोझ बन गई, टूटते कंधों में फिर भी उम्मीद है, सपने भी, इज़्ज़त के साथ मरने के! और घर की बात घर में तालाबंद है, सात जनम का संग है, थप्पड़ ओ लात, फ़िर हुई मुलाक़ात नई बोतल के साथ! देशभक्त, अनुशासन युक्त, एक वर्ग, खुश है, इस मुश्किल दौर में सोच मुक्त है, सरकार से कंधा मिलाए, देश चल रहा है, बढ़िया से घर बैठे! रामराज्य!!

जितनी लंबी चादर!

आज खाने में आम्रखण्ड रोटी हुई, बेशरम सेहत थोड़ी और मोटी हुई! अंगड़ाई ली और सोचा, किसी की मदद की जाए, धूप से बिटामिन डी ली जाए, पेट भरा हो तो दया अच्छी आती है, भूखे को दिया तो दुआ सच्ची आती है! मजबूर मांगता भी ऐसे जैसे हम भगवान हैं, कानों में मिसरी डाले इतना जो सम्मान है! घर बंगला गाड़ी, सूट साड़ी, इसमें दो चार सौ हज़ार से अपनी ज़ेब को क्या फर्क, चलिए इसी बहाने करें स्वर्ग! वैसे भी हम काफी शरीफ़ हैं अच्छे इंसान, पढ़े लिखे मेहनती, जैसे हमारे बाप और उनके बाप! अब जो बेचारे हैं वो तो बेचारे हैं, अशिक्षा के मारे हैं, इनका क्या करें सदियों से ये गरीब हैं, पहले गाँव के गरीब अब शहर के फ़क़ीर हैं, समाज में ये तो होता है, जब हमारे दादा गांव में मुखिया थे, इनके परदादा उनके सेवक दुखिया थे! बड़े दयालु थे वो, इनके पूरे परिवार को पाला! अब ये लोग शहर आ गए चकाचौंध देखकर, सोचते नहीं हैं ये लोग पैसे के पीछे भागते हैं, पर गरीब की किस्मत देखिए! कौन समझाए, मजदूरी कर के क्या तीर मारेंगे, चलिए, कोई बात नहीं दान धर्म हमार...