सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

लॉकडाउन लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ओ माँ!

"जो बोल नहीं सकते क्या उनको सुन सकते हैं? उनके दर्द को अपने दिल में क्या हम गुन सकते हैं?" ओ माँ और कितने कदम चलना है, छोटा बहुत हूँ और कितने दिन पलना है? ओ माँ ओ माँ तेरी आँखों में जो चमक है, तेरे प्यार में जो नमक है, क्यों फीके पड़ते हैं ओ माँ ओ माँ मैं दौड़ तो जाऊं, पर इतने लंबे रास्ते क्यों हैं, मेरे पैर नाचते क्यों हैं कांपते क्यों है ओ माँ ओ मां तेरा कंधा चुभता है, और सूरज भी, मेरे सर भी गठरी दे दे मैं भी बड़ा हो जाऊं ओ मां भूख बोलूं, प्यास बोलूं, क्या तू है उदास बोलूं तू बोले तो मैं बोलूं चुप हूँ अभी ओ मां

अजनबी मुल्क!

अजनबी अपने ही मुल्क में, यूँ हमसे वास्ता कर लिया? सब कट लिए अपने अपने रास्ते, क्यों हमने ये रास्ता कर लिया? हम यकायक सामने आए, उसने पतली गली को रास्ता कर लिया! घर से इतना दूर कैसे हो गए शहर ने ऐसा रिश्ता कर लिया! मजबूर हैं तो मदद मिल गई, मजदूर खस्ता हाल कर दिया! जितने थे यकीं सब टूट गए, मूरख थे सो भरोसा कर लिया! वंदे मातरम जबरन बुलवा के देश भक्त मूरख बना दिया! लाठी पुलिस की बोलती है,  इसने कब सरम कर  लिया? मेहनत बड़ी सस्ती है यहाँ, लंबा घर का रास्ता कर लिया! भूखे रहें बच्चे कि हाथ फ़ैलाएं इज्ज़त यूँ दरबदर कर दिया!  पूछते हैं के वापस आओगे? बेशर्म  शहर सवाल कर लिया! जात धरम सब याद दिलाए, सरकार ये कमाल कर दिया

बदलती पहचानें!

घर बैठे बदल रहे हैं, नये खेल चल रहे हैं, डर अब समझदारी ये चाल चल रहे हैं!  ताकत की दुकान है,  बड़ी लंबी लाईन है!  डर खरीद कर सब अब निकल रहे हैं!! बेबस सुबह है रोशनी के बावज़ूद,  आईने सब पूछते हैं क्या वजूद? प्यार ही बचाएगा, प्यार ही जगाएगा,  दूर हो या पास, प्यार से हो जाएगा! गलत करने को अब गम काफ़ी हैं, बहक जाएं कदम अब तो माफ़ी है? सवाल हैं हर तरफ़ आप पूछना चाहें तो, सवाल ये है कि आपकी नज़र में क्यों नहीं? जो सामने हैं वो सवाल है, हाल नहीं, आप पूछेंगे या माकूल हालात नहीं? अपनों कि परिभाषा इतनी तंग क्यों है? दुसरे को गैर बना दें, ऐसे ढंग क्यों हैं? सोच उड़्ती है या सिकुडती है? जोडती है या बिखराती है? बवज़ह नहीं हैं आसमान, आपकी नज़र कहां जाती है? नफ़रत गर जवाब है तो सवाल क्या था? तंग कर दे नज़रिया वो ख्याल क्या था? वादे ईरादे हैं क्या? या सिर्फ़ बातें हैं? नीयत साफ़ नहीं, एक यही सच बचा है! आईने अलग, तस्वीर अलग, मैं एक कहाँ?  जैसे-तैसे, जहां-तहां, यहां-वहां, कहाँ- ...

रास्ते मजदूर

(पैदल मजदूर) किसी का दर्द हमको कभी परेशां ने करे, या खुदा हालात मुझे ऐसा इंसान न करे! लाखों को सडक़ पर लाकर छोड़ दिया, एक के साथ भी ऐसा बुरा अंजाम न करे! सामने आने तक ज़ख़्म ज़ाहिर न हों, सोच मेरी तू आँखों का माजरा न करे! शहर में था तो मेरे बहुत काम आया, (वो)तहज़ीब कहाँ जो उसको पराया न करे! (मेरी प्रिवलेज) मेरे आराम का उसके पसीने से वास्ता कोई? मदद हो मेरी पर मुझको मेहरबाँ न करे! आबाद होने को वापस यहीं बुलाएंगे, अभी ये इल्ज़ाम की शहर को कब्रिस्तान न करे! (कोरोना! बाप रे! तबलीकी, जमात, जिहाद जिहाद) मुश्किल में थे तो हमारे मुसलमां जा बने, नफ़रत को कोई सोच यूँ आसां न करे! अपने ही दर्द को कुर्बान हो गए रास्ते में इस ख़बर को कोई अब पाकिस्तान न करे! (पीएम केयर, कब और कहाँ?) मदद करने को ख़ज़ाने खड़े हो गए, इन दिनों वो क्यों इस तरफ रास्ता न करे? खुदा बनने को मेरे तैयार हैं कितने देखो, शिकायत पुरानी क्यों मुझे मसीहा न करे?

ये कैसी सरकार!

आत्मनिर्भर मजदूर    घर से दूर, अपने पैरों चले हैं, सरकारी फैंसले हैं? ये कैसा सरकारी खेल है, कमजोर है वो फेल है? महंगी बड़ी रेल है, सवालों को जेल है? जाको मारे सरकारी नीती,  राख हवा में होई, कदम कदम चल मरेगा,  चाहे मदद जग होई! लोकतंत्र पर लॉकडाउन, ये कैसी सरकार हुई? मजलूमों से आँख फ़ेरती  क्यों ऐसी नाकार हुई? वादे ईरादे हैं क्या?  या सिर्फ़ बातें हैं? नीयत साफ़ नहीं,  एक यही सच बचा है! मज़बूरी को बिसात पर चाल बनाते हैं, बड़े बेगैरत हैं जो सरकार चलाते हैं! सरकार ने अपने को बचा कर रखा है, खुद से ही बस अच्छे दिन का वादा है!! मूरख सी सरकार है,  कुछ कहना बेकार है! भूखे को इज्ज़त नहीं,  हालात-ए-ज़ार है! चलिए कुछ दान करते हैं, ख़ुद को ज़रा महान करते हैं! सवाल पूछने का वक़्त नहीं, सर-आंखों सरकारी फरमान करते हैं!

सब चंगा सी!

लॉकडाउन चालिसी, दोष तब्लीसी, जिम्मेदारी बदलिसी मूरख पब्लिसी! मुसीबत असलिसी मदद नकलिसी, सब चंगा सी! मजदूर पैदलसी भूखे बेहदसी, नफ़रत निकलिसी, बीमारी चीनीसी, टेस्टिंग कछुए सी, सब चंगा सी! लॉकडाउन चालेसी,  चार बार लागेसी लाख पास आलेसी, सरकार जालीसी, या सोई, आलसी, मूँह में गालीसी, वादे लाखों से नीयत जाली सी सब चंगा सी! हाथ फ़ैले सी झोली खाली सी, भुखी प्यासी.   बेटी रुंआसी, हरसू बदहवासी इतनी उदासी,  सब चंगा सी!

यही होता आया है!

जो जहां है वो वहीं रहेगा! जो होता आया है वो ही होता रहेगा? कहने को लॉकडाउन है! नया क्या है? पुरानी सामाजिक व्यवस्था है! सदियों से, लाखों को किसने छुआ है? या छूने दिया है? मजदुर रास्ते में अटके हैं, यूँ कहिए रास्ते में भटके हैं, अधर में लटके हैं, न घर ने घट के हैं टूट गये जो अभी तक चटके हैं, रोज कमाते थे, कुछ खाते कुछ गंवाते थे, बस्ती में, कौन वसूली को आते थे, कल के भरोसे आज थे, और कल किसने देखा है? आगे की क्या सोचें आज भी, वही लक्ष्मण रेखा है! बीमार हस्पताल में हैं, घेरों में सवाल के हैं, जात क्या है, ध्रम? झुग्गी वाले!! बाप रे! क्या बदल रहा है? बीमारी नहीं, बीमार को दोष है! बीमार अछूत है, और डॉक्टर, नर्स भी! (करो घर खाली) हमारे दिमाग अब भी वर्तमान भूत है! छूत-अछूत है! ज़ाहिर है लोग छुपाते हैं, चुपचाप खामोशी से कोरोना फैलाते हैं! पकड़े न जाएं, विदेश सफर से, बुखार उतार दवाई खा कर आते हैं! क्रोनोलॉजी समझिए, बुखार - टेस्ट - पॉज़िटिव अछूत - अस्पताल सरकारी गंदे टॉयलेट, लांछन, शर्म, दोषःरोपण अपराधबोध समाज में धब्ब...

जितनी लंबी चादर!

आज खाने में आम्रखण्ड रोटी हुई, बेशरम सेहत थोड़ी और मोटी हुई! अंगड़ाई ली और सोचा, किसी की मदद की जाए, धूप से बिटामिन डी ली जाए, पेट भरा हो तो दया अच्छी आती है, भूखे को दिया तो दुआ सच्ची आती है! मजबूर मांगता भी ऐसे जैसे हम भगवान हैं, कानों में मिसरी डाले इतना जो सम्मान है! घर बंगला गाड़ी, सूट साड़ी, इसमें दो चार सौ हज़ार से अपनी ज़ेब को क्या फर्क, चलिए इसी बहाने करें स्वर्ग! वैसे भी हम काफी शरीफ़ हैं अच्छे इंसान, पढ़े लिखे मेहनती, जैसे हमारे बाप और उनके बाप! अब जो बेचारे हैं वो तो बेचारे हैं, अशिक्षा के मारे हैं, इनका क्या करें सदियों से ये गरीब हैं, पहले गाँव के गरीब अब शहर के फ़क़ीर हैं, समाज में ये तो होता है, जब हमारे दादा गांव में मुखिया थे, इनके परदादा उनके सेवक दुखिया थे! बड़े दयालु थे वो, इनके पूरे परिवार को पाला! अब ये लोग शहर आ गए चकाचौंध देखकर, सोचते नहीं हैं ये लोग पैसे के पीछे भागते हैं, पर गरीब की किस्मत देखिए! कौन समझाए, मजदूरी कर के क्या तीर मारेंगे, चलिए, कोई बात नहीं दान धर्म हमार...

तालाबंदी 2 बनाम मौत का फरमान!

ज़िंदगी से मिलने को ताउम्र चला है, बिना चले कब उसका काम चला है? रास्तों में रोक दिया है जिंदगी को, किसको बचाने का इंतज़ाम चला है? मुट्ठी दो मुट्ठी चावल थमा देते हैं, खैरात हो जैसे ये काम चला है? घर बैठे भक्ति से हुक्म बजा लाते हैं, बिन सोचे समझे सब काम चला है? चकित हैं मजदूरों की बेशुमार भीड़ से, पढ़ा-लिखा मुल्क क्यों हैरान चला है? किसी की मजबूरी को मज़हब बना दिया, कैसा इन दिनों खबरों का निज़ाम चला है? वो काम बोले जो चुटकी बजाते हो गए, ध्यान बटाने से बाज़ीगर का नाम चला है! मजदूरों को मरने का काम मिला है, लॉकडाउन में ये असल काम चला है! भूख प्यास मजबूरी का लंबा सिलसिला है, बिन काम कैसे मजदूरों का काम चला है! डॉक्टर भी खा रहे हैं मार, गुस्से ओ नफरत की? कुछ ऐसा सरकार से पैग़ाम चला है? अपना धर्म सनातन, मज़हब उनका जिहादी, किस रास्ते इस दौर का इंसान चला है?

कोरोना बहके बहकाए!

कहते हैं आपदा बड़ी है, जरुरत सब साथ आएं, हाथ बटाएं, जुगत बिठाएं, कोरोना से बचें-बचाएं,  और फ़िर शुरू तमाशा,  काम की बात गुल,  मार्च अप्रैल फ़ूल- पुरा बीमारी के साथ, बेचारी से मौत डॉक्टर नर्स बिना जरूरी सामान ताली सुन कर चलाओ काम! जो बीत गई सो बात गई, बड़ी रोशन कल की रात गई, जोश जुनून जज़्बात गई, समझ को जैसे लात गई, भुल सब हालात गई, कोरोना को कहते मात गई? सोच भी जल गई, इरादे भी जल गए, फिर रोशनी की आड़ में, अंधेरों से मिल गए, भीड़ में निकल गए! ज़िंदगी जी रही है बंद कमरों में, मौत सड़कों पर मजदूर चर रही है! टीवी पर देखिए आराम से खबरें, नफ़रत आपकी रगों में पसर रही है! बंद हैं सब चारदीवारी में, वो सच जिनको आवाज़ नहीं, मासूम जिनकी परवाज़ नहीं, गालियां, थप्पड़, चीख़, दया की भीख, दस नौ आठ , दस नौ एक (10 दिन के लॉक डाउन में लगभग एक लाख फ़ोन  (1098-चाइल्डलाइन, 1091 महिला हेल्पलाईन) आए,  बच्चों और महिला को हिंसा से बचाने के लिए ) खबर सारी हिंदू भई, कुत्तन सा सोर मचाई, तबलीकी, तबलीकी बोल कान सबई ...

कोरोना बीमार!

बीमार करके फ़िर दवा देते हैं, आपको तारीफ़ की वज़ह देते हैं! दवा दे कर बीमार करते हैं, किराया बस को हज़ार करते हैं!! बस इरादा नहीं काफ़ी, नेकनीयती का, पहले ये कहिए क्यूँ हमें लाचार करते हैं?? क्यों कोई शराफ़त देखे उनकी, जो? सवाल पूछने पर गुनाहगार करते हैं? छोड़ दिया सड़क पर लाकर सबको, सरकार हाथ जोड़ मज़ाक करते हैं? भूख, प्यास मजबूरी से मर गए कई, कहते हैं, हम मन की बात करते हैं!! गलती नहीं मानते, पर माफ़ी मांग गए, तमाशे वो ऐसे सौ -हजार करते हैं! मिला बहाना तो इल्ज़ाम ज़िहाद का, नफ़रत से सरकार बड़ा प्यार करते हैं? बीमारी को मज़हब, जंग ओ जिहाद? दिलों में दीवार हो वो हालात करते हैं! कातिल हैं वो दवा की बात करते हैं, जानलेवा है वो जो इलाज़ करते हैं!