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इरादा-ए-इत्तफाक!!

यूँ की यूँ ही कुछ नहीं होता, इत्तफाक से, एक आग है, जो पलती है, ओ जलती है, आपके एहसास, रवैये में, जज़्बे में, बात में, आपके सवाल, आज़ाद हैं,  आपके कब्ज़े में दम नहीं तोड़ते, दुनिया की ज़ंजीरो में, हरदम तय तस्वीरों में, जो आपको समेटना चाहती हैं, अपने रंग-ढंग और तौर में, आप जुदा हैं, इसलिए गुमशुदा हैं, अपनों में, ढूंढते, हमदिली! (समर्पित उस जज़्बे को जो लड़की होने की सारी चुनौतियों से दो-चार होते, अकेले, अपने सच को तलाशती रहती है)

क्या जानें, कौन माने!!

जो आंखें देखती हैं, वही आंखें दिखती हैं! बात किस की है? ये सवाल किसका है? ये हाल किसका है? यूँ मलाल किसका है? जो देख रहा है, उसे देखते हैं! सच, अलग अलग देखते हैं! एक ही बात कहाँ है, इतना बड़ा जहां हैं? आप कहाँ पहुंचे, और वो रास्ता कहाँ है? मुसाफ़िर कई हों, रास्ते पर, पर सफ़र एक नहीं, असर? अंजाम? नज़र देखती है, नज़रिये से, ये ही ज़रिया है, आपका क्या? कहाँ पहुँचे हैं? पहुँचना कहाँ हैं? किस बात से तय? ओ तय बात क्या है? हूँऊं, ओह, क्या, वाह, अच्छा, शायद, याने, हज़ार ख़याल मन में, क्या जानें, कौन मानें?

अपना जूता अपने सर!

अपने ही पैरों खड़े हैं, यूँ नहीं कि किसी से बड़े हैं! अदब है, यूँ नहीं कि आप बड़े हैं, नज़र आता है कि सीधे खड़े हैं! हमसे मत करिये रवायतों का जिक्र चाल चलन को हम चिकने घड़े हैं! कोई साथ ले कर नहीं जाता, गले शायद धूल बन कर पड़े हैं! सच यूँ भी हजम नहीं होता उपर से करेले नीमचढे हैं! एकतरफ़ा आईनों के जंगल में, सब अपने ही रस्तों के बड़े हैं! हमसे नहीं होती ईमारतें उँची, एक बूँद में भी समंदर बड़े हैं! वो सफ़र ही क्या जो खत्म है, इसी जिद्द पर आज भी अड़े हैं! जो पैर है वो ही जूता सर है, हम आदतों के खास बिगड़े हैं!

भीड़ की रीड!

सवाल?  क्यों लोग लगे रहते है दिन भरने में,  रोज़-रोज़ वही करने में जिसमें जी नहीं? ये कहते हुए कि ये ज़िंदगी का सच है,  गुजारे की demand - too much है? क्या उऩ्हें मजबूर करता है? अपने अंतर से दूर करता है? क्यों ये सवाल? क्यों वक्त के मारों के जख्म पर नमक छिड़क रहे हो मेरे भाई ? चल रहे हैं वही जिंदगी ने जो राह दिखाई , आप ने सपनों को रास्ता बना लिया , अपनी मुश्किलों का नाश्ता बना लिया , आईने के सामने खड़े होकर सिर्फ़ अपनी खूबसूरती या  उसकी कमी को परखने कि जगह , आपने सवाल पूछ लिये ? तो लो अब भुगतो , अब आपको जिंदगी मज़े से जीनी पड़ेगी , कभी आप भी परेशानियों से अपना सर खुजाएंगे , ( तेल क्यों नहीं लगाते हीरो ) पर फ़िर भी मुस्काराऐंगे , आपने अपने सपनों को पालना सीखा है , पर घर और स्कूल में उनको टालना सिखाते हैं , और जरूरतों का क्या बतायें , उसकी परिभाषा कहां से लायें , देखो तो , लाखों हवा खा कर भी जिंदा हैं ? सवाल लाख टके का है ? ताकत किसके हाथ में है ? " कौन कहता है कि चक्की में पिसे रहो ?" घर - बाहर , स्कू...

एक सुबह _ _ _ कोई एक!

अलसाये हुए ख्वाब, मुंदी हुई आंखे किसको फ़ुर्सत है कि सुबह करे एक अंगड़ाई लें, चलो आज फ़िर दोपहर करें !  पहलु से कुछ लम्हे, अभी निकले हैं, कुछ लम्हॊं को, ज़ज्ब  करने! जो हमेशा मेरी करवटॊं के साये हैं और एक मुस्कराहट, जो बिखर के आज़ाद है, किसी भी कंधे बैठने को, कैसे कहुं ये मेरी है! हालात कि, ज़ज्बात की, या अभी अभी जो गुजर गयी, एक नन्हे लम्हात कि! और ये आराम नहीं है, सिर्फ़ पैर पसारे हैं, हाथ खड़े नहीं किये, जिंदगी दौड़ नही है, क्या समझेंगे वो, जिनके रास्तॊं को मोड़ नहीं हैं!  झुले जिंदगी के, कुछ भुले नहीं हैं, दो घड़ी अलसाये हैं, ललचाये नहीं हैं, हुँ! शायद थोड़ा सा, एकटु! पर थोड़ी आंखे भी खुली हैं, अभी-अभी सुबह धुली है, सुखने तो दीजे, फ़िर आज़ को इस्त्री करेंगे, स्त्री है, तो क्या? जरुरत को मिस्त्री करेंगे!  और सुबह अकेली हो जाती, सो हम ठहर गये, चंद करवटें, कुछ‌ अंगड़ाई, क्या हुआ जो पहर गये, अपनी ही सांसॊं का, धड़कन का, साथ हम ही नहीं देंगे क्या?  एक दुनिया ये भी है, जो भागती नहीं, बिन आँखें बंद किये जागती नहीं, जहां रुकना आराम नहीं है(हराम वाला) सिर...

अज्ञातमित्र

मैं अज्ञात हूँ थोडा बहुत विख्यात हूँ  किसी दिन अपनी जीत हूँ किसी दिन अपनी मात हूँ अपने ही मुहं से निकली हुई बात हूँ  चाँद का इंतज़ार करती रात हूँ शतरंज पर बिछी हुई बिसात हूँ अपनी ही शह को दी हुई मात हूँ मर्द जात हूँ जात निकला जमात हूँ न बोला जो कभी वो ज़ज़्बात हूँ कहने को ये सब तो फिर क्यों अज्ञात हूँ बची हुई स्याही, अनकही लिखाई दवात हूँ मित्र हूँ अधूरा है जो अभी वो चित्र हूँ लकीरें है आकार नहीं रंग है पर रंगत नहीं पंक्तियाँ है पर पंगत नहीं साथी है पर संगत नहीं मैं अधुरा हूँ इस विचार में पूरा हूँ थोडा गोरा, थोडा भूरा हूँ बचे हुए लड्डू का चुरा हूँ अपने ही हाथ में दिया कटोरा हूँ जो सामने आया वही बटोरा हूँ सारी परम्पराओं का ठिठोरा हूँ! नयी बातों को नौजवान छोरा हूँ जहन में समंदर हैं फिर भी कागज कोरा हूँ !