ज़िंद गी क्या है, आख़िरकार? कोई वज़ह है? या बस साँसों के चलने की एक जगह है? भय की वजह है? लॉक डाउन, सोशल डिस्टेंसिंग कल के लिए बचने को? हक़ीकत सपने में बदल रहे हैं! क्यों उलटी चाल चल रहे हैं? बच्चे खेलें नहीं? भूखे काम न करें? घर अंदर हिंसा नाकाम न करें? फसल के दाम न करें? मरना कोई नयी बात है? या बस मर्द ज़ज्बात हैं? बीमारी को हराना है? किसी कीमत? तरक्क़ी सदियों की, सभ्यता विकास की, विवेक की, एहसास की, आभास की? निल बट्टे सन्नाटा? घर बैठ जाओ, किसी से मिलो नहीं, सुबह चलो नहीं? अरबों किताबें, लाखों गुणीं बातें, सौ -हज़ार भगवान, फिर भी बात मौत की सब काम तमाम?
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।