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निल बटे सन्नाटा!

ज़िंद गी क्या है,  आख़िरकार? कोई वज़ह है? या बस साँसों के चलने की एक जगह है? भय की वजह है? लॉक डाउन, सोशल डिस्टेंसिंग कल के लिए बचने को? हक़ीकत सपने में बदल रहे हैं! क्यों उलटी चाल चल रहे हैं? बच्चे खेलें नहीं? भूखे काम न करें? घर अंदर हिंसा नाकाम न करें? फसल के दाम न करें? मरना कोई नयी बात है? या बस मर्द ज़ज्बात हैं? बीमारी को हराना है? किसी कीमत? तरक्क़ी सदियों की, सभ्यता विकास की, विवेक की, एहसास की, आभास की? निल बट्टे सन्नाटा? घर बैठ जाओ, किसी से मिलो नहीं, सुबह चलो नहीं? अरबों किताबें, लाखों गुणीं बातें, सौ -हज़ार भगवान, फिर भी बात मौत की सब काम तमाम?

इंसानी प्रकृति!

आपसी रिश्ते सिर्फ़ इंसान से रिश्तों से खून के जातीय मकान से खरीदे सामान से पसंदीदा पकवान से पालतू जानवर , या धर्म की मानकर और धरती से ? जिसके उपर सब खडे हैं ! क्या हम सब चिकने घडे हैं ? कहां वो शुरुवात हुई , जो आखिर हमारी मात हुई ? एक अलग ईंसानी जात हुई बुद्धि , विवेक , संवेदना की बात हुई ? और फ़िर लगे जंगल कटने , जानवर जंगली बन गए , संरक्षित , जो बचे हैं , हमारी दयामाया से , क्या है हमारी प्रकृति ? हरियाली से हमारा क्या रिश्ता है ? या वो सिर्फ़ एक चीज़ है , बाज़ार की दुनिया वाली , इस्केवर फ़ीट के दाम वाली , या छुट्टिंओं वाली , हमारे ज़िंदगी के हसीन पलों की , याद दिलाने वाली , तस्वीरों की पॄष्ठभूमि ? धरती को माता कहते हैं , इसे तो नाता कहते हैं ! इंसानी दुनिया को पालने - पोसने वाली , फ़िर क्यों ये हाल है ? क्यों प्रकृति बेहाल है ? भूकंप , सुनामी , सायक्लोन , ज्वालामुखी , जंगल जंगल आग कहीं ये जज़्बात तो नहीं ?

विकास विकासम विकासस्यम!

ये दुनिया,  और हम इंसान,  इसका केंद्र,  सब कुछ हमारे इर्द-गिर्द घूमता है,  क्योंकि हमें आगे बढना है,  सबसे आगे,  हर उंचाई पर चढना है, हमसे बेहतर क्या है?  ये कोरोना क्या है? तमाम ज़ंग हैं,  जिनसे लड़ना है,  भूख, पितृसत्ता, घरेलू हिंसा  देह व्यापार, बाल मज़दुर  और हमने क्या चुना है?  नफ़रत, मज़हब,  फ़ूट डालो और राज करो!  अमन-शांति  सब को जगा देगी,  उन सवालों तक पहुँचा देगी,  जो सच की तलाश में हैं! बादल,  हमारा आसमान हैं,  ऐसा हमारा ज्ञान है  जो सामने आ गया  उस को सच करते हैं,  खोज, तलाश, शोध  विज्ञान, सवाल, सुक्ष्म सोच,  ये सब बेकार बातें हैं  हमारे सच, आजकल  व्हाट्सएप पर आते है और हम उसे,  और दस लोगों तक पहुँचाते हैं,  फ़ॉरवडेड एज़ रिसीवड! एक बीमारी के फ़ेल हैं  घर बैठे जेल हैं  तरक्की के ये खेल हैं  एक वाइरस के बेकार हैं इतने हम लाचार हैं  'कुछ नहीं कर सकते'  ये विशेषज्ञों के उपचार हैं  कोविड 19 की व्यापकता  और गु...

नैतिकता के बाज़ार!

इंसान उद्दण्ड हैं, झूठा सब घमंड है, दुनिया पर वर्चस्व का, नैतिकता, सभ्यता, घटिया मज़ाक हैं, बाज़ार का राज है, और सब बिक रहे हैं, मुंहमांगी कीमत मिले तो आप विजेता हैं, सही कीमत, आंखों पर पर्दा है, आप फिर भी सामान हैं! दर्द न हो  इसलिए मर्द हैं? तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, एक्सप्रेस हाइवे,  चमकीले साइनबोर्ड, गगनचुंबी इमारतें,  क्या दिखाते हैं,  लॉकडाउन में  क्या छुपाते हैं,  हैरतअंगेज बात,  लाखों सड़क पर  तब कहाँ जाते हैं? चलते नज़र आते हैं,  जब शहर चलता है! सब कुछ ख़त्म नहीं है, कितनों ने हाथ बढ़ाए हैं, कंधे मिलाए हैं, मजबूरी के दर्द, दर्द की मजबूरी आमने सामने हुए साथ आए हैं, हमदिली है, शुक्र है, सब का, गुज़ारिश एक, सवाल एक साथ रखिए, कल हमें ये सब, कहाँ नज़र आएंगे?

सबका विकास, अकल का अवकाश!

सब बडा है,  सभ्यता, तरक्की, घमंड  और बड़बोलापन,  इंसान आज  घुट्ने टेके खडा है! चाँद तक पहुँच है,  दिमाग की समझ है,  सूरज की बिजली,  जमीन से तेल,  तेज़ रफ़्तार सब,  और अब? हर तरफ़ जंग है,  सोच इतनी तंग है,  किसी को पीछे छोड देना,  कामयाबी है!  नज़र नहीं आती,  चारों तरफ़ बरबादी है! आईने  दिखा देंगे सच,  आप नकाब तो हटाईए,  आप पूरे हैं,  और क्या चाहिए? सुनिए, खुद को, गौर से,  दूर हो,  दुनिया के शोर से,  आप किसी की राय नहीं हैं,  उदासी को निराश न करो,  अकेलापन, अधूरा मन,  सुन,  आपको दोषी नहीं ठहराता!

छुट्टी का दिन!

हुई कि नहीं सुबह? दिन निकल आया  रोशनी भी है पर ना सूरज है ना सुबह की चमक? हवा झकझोर रही है, बादल घनघोर रहे हैं, चाय का जायका वही है! पर असर अलग हो गया मौसम छुट्टी वाला है, पर यह कैसे समझे और किसे समझाएं? जुत गए हैं सुबह सब फिर से, कल को आज और आज को कल करने में! वही अपनी हाजिरी भरने में? बैल खेत जोत रही है, गधे घास  चर रहे हैं, भेड़ चाल चल रही है,  और हम इंसान सर्वोच्च प्राणी, आजाद, समझदार, चलिए जाने दीजिए देर हुई तो फिर ट्रैफिक में...

शिकवा ए सुबह!

पूना शहर, जैसे इमारतों का कहर, फर्क पड़ता है? क्या शाम, क्या सहर? फर्क पड़ता है! आपकी नज़र का, उसके असर का, आप पर? पर आप को फुर्सत कहाँ? यूँही गुम होती... एक और सुबह!

कसम कुदरत की!

कुदरत नेमत है और, ख़राब इंसानी नीयत, ऊपर से ये शिकायत, की ठीक नहीं हालात! कुदरत शिकार है इंसानी फितरत की, इंसान तरक्की का शिकार है! रात भर सो उठे और सुबह इनाम मिली, प्रकृति की सोच सहज ओ आसान मिली! हमारी क्या प्रकृति है? दुनिया कि क्या आकृति है? प्रकृति से हमारा क्या रिश्ता है? या सामान मुफ़्त ओ सस्ता है सब एक दूसरे को कोसते हैं, जाने कैसे हम जीवन पोसते हैं!?? रोशनी चमकती है पर अँधा कर जाती है, सच देखने के सब तरीके बदल गए हैं!! अंधेरो में ऐसी क्या ख़ास बात है, सब अपने रस्ते निकल गए है! प्लास्टिक के फूलों से सजावट सब तरफ, दुनिया में तरक्की के नए खेल चल गए हैं !