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जाने दो!

"ऐसे कैसे जाने दें" ये सोच न आने दें रोकें अपने आप को टोकने से और कदमों को जाने दें आगे गहराई है, डूबने, चढ़ने की, सच्चाई है, कड़वी लगाम नहीं, चाल बदलना, रणनीति है, न की 'हाथ खड़े' न ही 'चिकने घड़े' मढ़ें, अपने सच, गढ़ें नहीं, लड़े नहीं अपने रस्तों से, बदलें, गिरें संभलें मुड़ें, जुड़ें, क्षितिज से वहाँ जहाँ होती है ज़मीन आसमान आसमान ज़मीन सच सही गलत अच्छे बुरे बीच घुटे नहीं! आपकी राय, एकतरफ़ा हो जुटे नहीं, नकारने सपना, दमतोड़ता कोने में आपके दिल के, "जाने दो" ये सोच न आने दो!

जाने दो . . !

हाथ खडे करने और जाने दो के बीच , लकीर है, या फ़ांसले , या बस शब्दों के कुछ चौंचले नहीं हो सकता असंभव, नामुमकिन ये रास्ते कहां जाते हैं ? कहां जा सकते हैं ? मेरे बस कि बात नही! कुछ भी मेरे हाथ नहीं! हाथ खड़े करुं या जाने दुं ? अब कुछ नही हो सकता ! मेरी किस्मत ही ऐसी है ! ये तो एक मकाम है , मकाम ? जहां रास्ते खत्म होते हैं, रुक जाते हैं , हाथ खड़े होते हैं , और सर झुक जाते हैं दुनिया अंगुठा दिखती है / दिखाती है और ऊंगलियां खुद कि , खुद को ही इशारा करती हैं . . . . . . . . . . .  जाने दो , मेरे बस की बात नही ! रुकावट के लिये खेद है मकाम, ये नहीं !? एक रास्ता खत्म हुआ और सफ़र ? मुसाफ़िर है , रास्तों का मुंतज़िर नही  पीछे पलटना , हर दम लौटना नहीं , मुड़ना भी हो सकता है नीचे जाते रास्तों का संकेत उड़ना भी हो सकता है , संभावनायें संमदर हैं जाने दो . . ! आप तैयार हैं ? या आपकी कमर पर /उमर पर . . . आपके खड़े हाथों का भार है ? [हार मानने (Giving up)और हालात समझ कर अपने कदम पीछे खींचने(Letting go) के बीच छुपे अंतर समझने की कोशिश, जान...