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पनपने के सच - बचपन

बचपन पनपता है, जवानी मचलती है, बुढापा ठहरता है! चलो बचपन पर लौट चलें, जम कर, जोश से, फूलें–फलें! अपना ही रास्ता बनें, बुनें! खिलना है, खुलना है, तमाम सच बदलना है हाल के, हालात के, उनसे जुड़े सवालात के, नज़रअंदाज़ जज़्बात के! पूछ लें वो सब सवाल जो डरे हुए है, क्योंकि बड़ों के जमीर मरे हुए हैं! उठा लें वो कदम जिसके नीचे की जमीन मालूम नहीं है, रास्ते ऐसे ही बनते हैं! आ जाएं साथ,  वही है बचपन की बात, कहां उसमें, दूसरे को कम करती मज़हब और जात? पनपना, फक्त जिंदा रहना नहीं है, बचपन की चाल चलिए खिलिए, खुलिए,  मिलिए हर पल से ऐसे जैसे ये पहली बार है, खेलिए, नौसिखिए बन, कुछ गलत नहीं, सब सीखने के नुस्खे हैं! दिल बचपन करिए, ज़िंदगी में जरा सचपन कीजिए! कोई द्वेष नहीं, घृणा नहीं, सब खेल हैं, मिलने के, दुनिया से,  उमंग से, चहकते हुए, साथ को बहकते हुए, जब तक है, तब है सौ फीसदी ! फिर कुछ और, या कुछ नहीं! न अपेक्षा , न उपेक्षा चलिए बचपन चलें?

इश्क़ समझ!

इश्क़ इज़हार है, समझदा र को इशारा नहीं, चलते बनिये जो उनको गवारा नहीं, खेलते खुजाते रहें, जिसे ज़ेब में रख्खा तमाशा नहीं,   इश्क़ जज़्बात है, मर्दानगी त्योहार नहीं, और बांट दे वो खुशी से  "हां", उनकी, दिवाली का खील बताशा नहीं! हंसकर बात करते हैं, ये हस्ती है उनकी, खुद को पसंद करते हैं, मुगालते हैं आपके, जो सोचे, आप पर मरते हैं!! इश्क़ साथ है,  दो लोगों की बात है, मिल्कियत नहीं, कोई मेरा हो गया, मान लेना, रिश्तों की नज़ाकत नहीं! इश्क़ सफ़र है, हमसफ़र सी बात है, मंज़िल नहीं, हासिल हो गया, बात ख़त्म, आशिक़ी की तर्ज नहीं! इश्क़ इज़हार है, इंकार है, इसरार है, इम्कान है, आसान नहीं, बात चलती रहे, हर सूरत जज़्बातों का मर्ज़ नहीं!

बेवजह सांसे!

  ज़िंदा हूं जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूं, अपनी बेशर्मी में पनाह लिए जा रहा हूं! उम्मीद भी नहीं बची और यकीन भी यतीम है, इस बेबसी को अपनी शमा किए जा रहा हूं! रोशनी भी है और तपिश भी अभी बाकी है, ख़बर नहीं किसको फना किए जा रहा हूं? जाहिर है वो सूरज भी रोशन होगा एक दिन, क्यों हालात को गुमां किए जा रहा हूं? नहीं आना है इस नामाकुल दुनिया में हरगिज़, क्यों फिर इतना पशेमान हुए जा रहा हूं? सिफ़र होने की तमाम कीमतें हैं इस उम्र, क्यों रिश्तों को सामान लिए जा रहा हूं?

गलत हिंद ई!

रम पराम पराम, उठे सबके कदाम, एजी ऐसे गीत जाया करो, अराम हेराम है, शराम बेशराम है, एक ही बज़ रंग हैं सब, और बड़े बदरंग हैं, दंग_आ नियत में रम गया है जैसे, सलाम का गला धड़ से कलम है, जयश्री रम गई है गटर की चकाचौंध में, कीचड़ नराम है सेज बनी सम विधान विषराम है,   अराम हेराम है, शराम बेशराम है, भग, वाह वाह हो रही चहुँ और, दंगआराम है,   समाचार व्यभिचार है, सच्चाई भक्त बनी है धूनी रामाए सारे दुष्कराम ही रम गए है कण कण, रम गए हैं, रम पराम पराम उठे सबके कदाम, योद्धा के सब धंधे हैं, बेसराम के बढ़े चंदे हैं डर से सब गंदे हैं, बदरंगी बंदे हैं! रम पराम पराम, उठे सबके कदाम, अजी ऐसे गीत जाया करो!

कुछ होना है!

"कुछ होना है" खेल है, दुनिया का! आप खिलौना हैं! सच तमाम है,  झूठ बोलते, उसके सामने आप बौना हैं! आप कम है, क्योंकि कोई ज्यादा है, खेल घिनौना है! कंधे किसी के सीढ़ी किसी को कामयाबी भी बोझ ढोना है! तराज़ू किस के, नाप किसका बाज़ार बड़ा है, आप नमूना हैं! रंग फीका है, ऊंचाई टीका है, वज़न ज्यादा कम मुश्किल होना है! "मैं" पहचान, पीड़ा, अभिमान, बड़ी तस्वीर, आप एक कोना हैं!

पहचानें!!

अपनी नजर से खुद को देख पाएं कभी ऐसा एक आइना बना पाएं! शोर बहुत है मेरी नाप तौल का , कोई तराज़ू मेरा वज़न समझ पाए? छोटा बड़ा अच्छा बुरा कम जादा, वो सांचा कहां जिसमें समा जाएं? नहीं उतरना किसी उम्मीद को खरा! जंजीरें हैं सब गर आप समझ पाएं! मुबारकें सारी, रास्ता तय करती हैं, 'न!' छोड़! चल अपने रास्ते जाएं!! वही करना है जो पक्का है, तय है? काहे न फिर बात ख़त्म कर पाएं? अलग नहीं कोई किसी से कभी भी, ज़रा सी बात जो ज़रा समझ पाएं!!

आसान मुश्किल!

ये जो मेरे जमीन आसमान हैं, ये ही मेरे सपनों के सामान हैं! मुझे कहां पंख लगते हैं, उड़ने? वहीं हूं जहां मेरे अरमान हैं! वो ढूंढे जमीं जो आसमान हैं! पैर कहते हैं पुरानी पहचान है!! फिक्र कहां, कब कहां पहुंचेंगे? चल दिए, वही अपना अंजाम है! खोए हैं, अपनी ही तलाश में, कौन कहता है काम आसान है? बनावट, दिखावट, सजावट सब, महंगा सामान ओ सस्ती दुकान है! अक्स है वो, सब जो तराशते हैं! कब समझेंगे बदलता मकान है!

ज़िन्दगी ख़ाक की!!

ज़िन्दगी दावत है, किसी को... बग़ावत है किसी की ? आदत है, किसी की मुश्किल, और कोई आसान, काम किसी का, नाम कोई बदनाम, मुफ़्त पहचान सरेआम, अकेले, भीड़ में, दौड़ रोज़ की, होड़, काहे? बेपरवाह, आगाह? अपने सफ़र से, दोस्ती, अजनबी मुसाफ़िर से, चलते रास्ते आपके, भांप के, नाप के किसी और के? किस छोर के? सहारे, या यकीन मंझदारे? सह रहे हैं या बह रहे हैं, ख़ामोश या कह रहे हैं? अपनी बात,  ज़िंदगी ज़ज़्बात, क्या परवा साख की? आखिर ज़िन्दगी ख़ाक की!!