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आग अपनी है!

जलते हैं अपनी आग में तुम क्या हमें जलाओगे, गले लगने तैयार हैं क्या तुम पास आओगे? जल रहे हैं वो भी जो हिम्मत कर के आ गए, राख बन कर कहते हैं, और कितना सताओगे? कुछ यूँ भी कद्रदान हैं जो पानी छिड़कने आ गए! बुझती हुई आग है, क्या अब भी यूँही चाहोगे? आग ख़त्म नहीं होती और राख भी नहीं होते! ज़ख्म पूरे हुए ही नहीं, मलहम जो तुम बनाओगे? हां जी!! राख हो भी गए तो हवा हो जायेंगे चीखती रहें सब ठोकरें के ख़ाक हो जाओगे! वो आग ही है जिसे तुम ज़ख्म कहते हो! जल जाओगे जो यूं रिश्ता निभाओगे!

एलिमेंट्स

  कोई लड़ाई नहीं है, हवा पानी पहाड़ में, जमीन आसमान में, आग और पानी में? पानी बुझा देता है, आग उड़ा देती है आपको लगता है ये लड़ाई है? खासी तंग सोच पाई है! यही सोच तहज़ीब बनी है, तरक्की का बीज बनी है, पीछे छोड़ देना, आगे जाने की शर्त है, ये कैसी यही कवायद है? आखिर सीखा क्या हमने, कुदरत से? पानी और आग की दोस्ती? जब साथ आते हैं,  हवा हो जाते हैं! हवा और पानी  जमीन की सवारी हैं, सदियों से ये सफर जारी है! कोई किसी से कम नहीं, न कोई किसी पर भारी! हर कोई वजह है,  जगह नहीं, पानी, हवा, आग, जमीन, कायनात के कलाकार हैं, कई प्रकार है, तमाम आकार हैं, और जहां जरूरी हो, शून्य, सिफर होने तैयार हैं! बड़ा छोटा, कम ज्यादा, आगे पीछे, ऊपर नीचे इस द्वंद, इस जंग में फंसे आप कब इन कलाकार से सीखेंगे??

अपने गिरेबान!

कहां रवि और कहां कवि एक अपनी ही आग में जलता है  , उसे क्या खबर कि  , उसी से जग चलता है ? दुसरा कहने से ड़रता है  , सीधी बात , घूमा - फ़िरा के  , चिंगारी पानी में लपेट के  , प्रवाह के वेग को शब्दॊं में समेट के  , और उम्मीद ये , उसकी आग दुसरों को जलायेगी  , चिंगारी एक दिन आग बनायेगी  ,    और वो अपने अहं की चट्टान चढ खुद की पीठ थपथपा कामयाबी अपने सर लेगा  ``````````````````````````````` और एक तरफ़ सुरज़ जो कल के , दू धदांत वाले गुमनाम बादल को भी गुज़रने देते हैं , चाहे वो उन्का मुंह काला कर के गुजरा हो शर्म से बादल ही पिघल जाते हैं  , और सावन के दिन आते हैं  , उन दिनों की ही  , कितने कवि रोटी खाते हैं और उनमें सुर बिठा  , कितने गले इतराते हैं और उस पर ये दावा  , जहां न पहुंचे रवि , वहां पहुंचे कवि ? मुर्खता या अंहकार  , कवि अंधेरों में अपनी रोटी सेंकते हैं  , चाहे वो खुद के हों , या दुनिया के और रवि अंधेरों को आज़ाद छोड़ता है अपने स...