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रिफ़्यूज़ी!

समंदर और साथ सफ़र, लहर साहिल मुक़म्मल, अधूरे किनारे, हर लम्हा बदलते, रुके हैं पर खत्म होने को... लहरें बहती हुई, पर कहाँ जाने को? और साथ, मुसाफ़िर, बिछड़े, भटके, अधर में अटके, न छत सर है, न लम्हे असर हैं, रास्तों को खुद नहीं पता, वो कहाँ जाएंगे, कैसे कहें उनको के ज़िन्दगी सफर है, बेबसी रहगुज़र है?

बंजारियत!

आज सुबह की दौड़, बेजोड़, नयी शक्ल हर मोड़, और दौड़ ज़िन्दगी, कोई फुर्रर्रर कोई खिरामां खिरामां, सोचने का वक्त नहीं, किसी को, और कोई मगन है ख्यालों में, कोई सेहत के लिए भागता है, और कोई नेमत को, और काफ़ी अपनी कीमत को, और समंदर दूर से, बारीख़ी से, कुछ नहीं कह रहा, अगर आप सुन पाएँ, तो समझेंगे, सच कुछ नहीं है, बस आपकीं राय है!

घुम्मकडियाँ!

इतिहास का इरादा क्या था? यूँ खड़े होकर, सरचढ़ बोलते, अपनी कहानी कहता है या मुँह चिढ़ा रहा है हमको? तुम ने कौन सा तीर मार लिया? अदना बन कर खड़े हो? हमारे साथ सेल्फ़ी लेते, लोग तुम्हें शायद लाइक करें?