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निल बटे सन्नाटा!

ज़िंद गी क्या है,  आख़िरकार? कोई वज़ह है? या बस साँसों के चलने की एक जगह है? भय की वजह है? लॉक डाउन, सोशल डिस्टेंसिंग कल के लिए बचने को? हक़ीकत सपने में बदल रहे हैं! क्यों उलटी चाल चल रहे हैं? बच्चे खेलें नहीं? भूखे काम न करें? घर अंदर हिंसा नाकाम न करें? फसल के दाम न करें? मरना कोई नयी बात है? या बस मर्द ज़ज्बात हैं? बीमारी को हराना है? किसी कीमत? तरक्क़ी सदियों की, सभ्यता विकास की, विवेक की, एहसास की, आभास की? निल बट्टे सन्नाटा? घर बैठ जाओ, किसी से मिलो नहीं, सुबह चलो नहीं? अरबों किताबें, लाखों गुणीं बातें, सौ -हज़ार भगवान, फिर भी बात मौत की सब काम तमाम?

जिंदगी साली मौत की घरवाली

हम को ही हम से छीनता है ये ज़िन्दगी का कमीनापन हैं! जिंदगी पर मेरे बड़े एहसान हैं, कैंसर के बदले मुस्कराहटें दी हैं! जीने का और बहुत मन है सिगरेट जैसी बड़ी बुरी लत है! हमें नहीं लड़नी कोई भी लड़ाई जिन्दगी अखाड़ा है ये बात पहले नहीं बतायी! हाँ नहीं तो! मौत कितनी पेटू,कितनी अघोरी है, तमाम ज़िन्दगी सूत के भी भूखी है! ज़िंदगी हाथ धो के पीछे पड़ती है, मौत से मिलीजुली साज़िश लगती है जब देखो बीमारी परस देती है ज़िन्दगी बड़ी बेगैरत मेज़बान है ज़िंदगी मौत के बीच इंसाँ फुटबॉल है, एक ने किक किया दूसरी तरफ गोल है! कहते हैं शरीर बस आत्मा का खोल है, पर मूरख आत्मा क्या जाने, बर्फी चौकोर लड्डू गोल है? कहते हैं आत्मा अमर शरीर नशवर है बेईमान सप्लायर है अगर घटिया घर है? ज़िन्दगी साली मौत की घरवाली निकली, निकला मतलब तो मुँ पलट के चल दी!! (उन जुझारुओं की झुंझलाहट को समर्पित जिन्हें अपनी हिम्मत और लगन केंसर जैसी फ़ालतू बीमारियों से लड़ने और उनके रस्ते अड़ने में लगानी पड़ती है)

और सफ़र अपने!

बदलते रस्तों के सामान, साथ को थोड़ी सी शमशान,  चलना काम है अपना, किसको परवा है क्या अंजाम! "एक सफ़र कई रास्ते, मुसाफ़िर होने के वास्ते, कितने मकाम ठाढें थे, सो कौन हुए हम आस्ते!" "सफ़र सबका है, और सब ही शुक्रगुज़ार भी, कहने को रुके हैं, मुसाफ़िर हम, तैयार भी!" "दिल को मिले दिलवाले, लम्हों का हलवा बना ले, जायके जिंदगी के सफ़र में, दावत कबूल हो!" "तस्वीर है या कोई तासीर है, मिजाज़ है या मर्ज़ी, तमाम तज़ुर्बे है इस सफ़र के और कलम दर्ज़ी!"   "तमाम सफ़र है रास्तों में गर आपको फ़ुर्सत है, रोज़ाना से दूर चलिये बड़ी हसीन फ़ुर्कत है!" न दूर जाने की बात है न नज़दीकियों से वास्ता,  प्यासी है रूह अपनी इसको नहीं कोई नाश्ता! "युँ तो आसमान भी काफ़ी नहीं, जो जमीं है वो भी कुछ कम नहीं!" सफ़र है पर सब चलते नज़र नहीं आते, कि अपनी ही तस्वीर में कैद हुये जाते हैं आप हैं हम हैं और वो कई इतफ़ाक,  चलने को पूरे हैं और रुकने को अधुरे! सफ़र अपने समय के मोहताज़ नहीं, जिंदगी तज़ुर्बा है सर का ताज़ नहीं! ...

कुछ तो बात होगी!

आवाज़ चीख बन जाये, उम्मीद भीख बन जाये  ऐसी जिंदगी से लड़ना क्या, जो लम्हों की टीस बन जाये सपने हैं अरमान नहीं, ऐसे सफर आसान नहीं सच्चाइयाँ रस्ते में है इस से हम अनजान नहीं!   पुरे कभी हो जाएँ , ऐसे कोई काम नहीं फुर्सत में सोचेंगे, अब ऐसे आराम नहीं ! उस मोड पर नहीं की रास्ते बुन लें चले हैं जिस पर उसी को गुन लें अपने ही चेहरे को पीठ दिखाते हैं  कभी कभी यूँ भी हम सामने आते हैं आसमान भी यकीन है, जमीं भी यकीं रास्ता ढूंढते हैं जो मिला दे कहीं   कुछ ती बात होगी नजर नहीं आती आँखों से मेरे दीवारें नहीं जातीं क्यूँ  हर ओर अंधेरा नज़र आता है, आँखों में ना-उम्मीदी का असर आता है!

कशिश - ए- खुदकशी!

मौत कितनी आसान है, जी करता है खुदकशी कर लूँ! जिन्दगी विस्तार है  दो हाथों में नहीं समाती , मौत आसान है, बाँहों में भर लूँ जिन्दगी कितनी लाचार, कितनी मोहताज़ है मौत का हर तरफ राज़ है  मौत जिन्दगी का ताज है  जिन्दगी मोह है, मौत सन्यास जिन्दगी अंत है, मौत अनंत  मौत पर न कोई राशन है, न प्रतिबन्ध  जिन्दगी है, न ख़त्म होने वाली लाइन का द्वन्द जिन्दगी अमीर है, गरीब है बेमुश्किल खरीद है मौत आसानी से हासिल  जिन्दगी के बदले की चीज़ है  जिन्दगी, कमज़ोर दिल वालों के बस की बात नहीं  मौत का कोई मज़हब, कोई जात नहीं जिन्दगी जड़ है, झगड़ा, फसाद है  सबको एक जैसी मौत को दाद है  आखिर कहाँ पहुंचा हमारा उत्थान है  कि मौत आसान है, फिर भी, जिन्दगी के पीछे दौड़ता इंसान है जो जुल्मी है, पापी है, शैतान है  उसी का सम्मान है! सरल, सहज, समान, हर एक को एक ही दाम मौत आसान है, इमान है  बिन मांगे मिल जाये वो सामान है सच कहते है, घर कि मुर्गी दाल बराबर ! पर क्या करें, जिन्दगी लालच है...