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खेल से मेल – खेल बेमेल!

एक और शनिवार, ख़ास फिर एक बार, बार-बार की खलबलाहट से, हँसी खुशी की बुदबुदाहट से, साथ जाकर, हाथों–हाथ पाकर गुजरे हुओं की समझ पाकर, स्वस्थ होते, दुरुस्त होते ये जरूरी है कि, अनहोनी के सदमों की तमाम परतें, पीढ़ी दर पीढ़ी रिसते ज़ख्म में बंधे हुए रिश्ते, और ऊपर से सियासती बदी, बोझ बन छोटे कंधों को, कम बेदम करती है.. आज फिर हम साथ हुए, खेल से मज़ाहमत करने, साथ की सांसे भरने, उम्मीद सांझा हुईं, दर्द को मिटाने नहीं, दूर करने, साथ चलने जिंदगी का जश्न, फैलते दायरे दर्द याद बने और हम सब आबाद! खेल खेल में!!   ( श्रीलंका में हम सिंधुजा के साथ पिछले कुछ सालों से प्ले फॉर पीस का काम कर रहे हैं. खासतौर से पिछले 2 सालों से. हाल ही में ही तूफानी बरसात से श्रीलंका में काफी बर्बादी फैलाई। जानमाल की, जैसा कि दुनिया में हमेशा बोला जाता है। पर ऐसी आकस्मिक हुई विपदाओं से पैदा हुई दिमागी परेशानी अक्सर जानमाल का ध्यान रखने में नजरअंदाज हो जाती हैं। ऐसे में सिंधुजा और उनके सहभागी तारका ने एक रिलीफ कैंप में जाकर बच्चों के साथ हर हफ्ते "खेल से मेल" के "शांति का अभ्यास सत्र" लेना शुरू किए. सिंधु...

गाज़ा की आवाज़!

 Translation of poem by Ni'ma Hasan from Rafah, Gaza, Palestine (https://www.facebook.com/share/r/17PE9dxxZ6/ ) जब तुम मुझे मेरे डर का पूछते हो, मैं बात करतीं हूं उस कॉफी वाले के मौत की,  मेरी स्कर्ट की जो एक टेंट की छत बन गई! मेरी बिल्ली की, जो तबाह शहर में छूट गई और अब उसकी "म्याऊं" मेरे सर में गूंजती है! मुझे चाहिए एक बड़ा बादल जो बरस न पाए, और एक हवाईजहाज जो टॉफी बरसाए, और रंगीली दीवारें  जहां पर मैं एक बच्चे का चित्र बना सकूं, हाथ फैलाए हंसे-खिलखिलाए ये मेरे टेंट के सपने हैं, और मैं प्यार करती हूं तुमसे, और मुझमें है हिम्मत, इतनी, उन इमारतों पर चढ़ने की जो अब नहीं रहीं,, और अपने सपनों में तुम्हारी आगोश आने की, मैं ये कबूल सकती हूं, अब मैं बेहतर हूं, फिर पूछिए मुझसे मेरे सपनों की बात फिर पूछिए मुझसे मेरे डर की बात! –नी‘मा हसन, रफ़ा, गाज़ा से विस्थापित  नीचे लिखी रचना का अनुवाद When you ask me about my fear I talk about the death of the coffee vendor, And my skirt  That became the roof of a tent I talk about my cat That was left in the gutted city and now meo...

मेरे गुनाह!

सांसे गुनाह हैं  सपने गुनाह हैं,। इस दौर में सारे अपने गुनाह हैं।। मणिपुर गुनाह है, गाजा गुनाह है, जमीर हो थोड़ा तो जीना गुनाह है! अज़मत गुनाह है, अकीदत गुनाह है, मेरे नहीं, तो आप हर शक्ल गुनाह हैं! ज़हन वहां है,(गाज़ा) कदम जा नहीं रहे, यारब मेरी ये अदनी मजबूरियां गुनाह हैं! कबूल है हमको कि हम गुनहगार हैं, आराम से घर बैठे ये कहना गुनाह है!  दिमाग चला रहा है दिल का कारखाना, बोले तो गुनहगार ओ खामोशी गुनाह है, जब भी जहां भी मासूम मरते हैं, उन सब दौर में ख़ुदा होना गुनाह है!

ओ माँ!

"जो बोल नहीं सकते क्या उनको सुन सकते हैं? उनके दर्द को अपने दिल में क्या हम गुन सकते हैं?" ओ माँ और कितने कदम चलना है, छोटा बहुत हूँ और कितने दिन पलना है? ओ माँ ओ माँ तेरी आँखों में जो चमक है, तेरे प्यार में जो नमक है, क्यों फीके पड़ते हैं ओ माँ ओ माँ मैं दौड़ तो जाऊं, पर इतने लंबे रास्ते क्यों हैं, मेरे पैर नाचते क्यों हैं कांपते क्यों है ओ माँ ओ मां तेरा कंधा चुभता है, और सूरज भी, मेरे सर भी गठरी दे दे मैं भी बड़ा हो जाऊं ओ मां भूख बोलूं, प्यास बोलूं, क्या तू है उदास बोलूं तू बोले तो मैं बोलूं चुप हूँ अभी ओ मां

दो बच्चे साफ़!

दो बच्चे, बुरे या अच्छे? झूठे या सच्चे? आपके या अनाप के? जात के या "छी! दूर हट" क्या उनका गुनाह हुआ? क्यों हिंदू थे? या "वो वाले हिंदू?" वही यार! समंझ जाओ! जिनका कोई कुछ नहीं कर सकता! हां हां! वही अछु...  नहीं नहीं दलित!  हा हा हा हा हा हा !!! इनका कुछ नहीं हो सकता,  ये सुधरेंगे!! (भारत माता की जय सच पर स्वच्छ की विजय) हां!! तो क्या हुआ, दो से कौनसे कम हो जाएंगे, नाली के कीड़े! अरे, उफ ये बदबू,  पोट्टी कर दी क्या  ये तुम्हारा लाड़ला, करा कर नहीं निकलीं थीं! उफ! जरा गाड़ी रोको (चीईईईईईईईईई!) चलो बदलो इसका डाइपर, (2 मिनिट) हो गया, चलो अरे! ये डाइपर फेंको यहाँ, नहीं है डस्टबिन तो क्या करें! फेंको इधर ही सड़क पर, ड्राइवर चलो! ज़रा ब्लोअर चलाओ, बदबू भर गई! हां ! मैं क्या कह रहा था?

बचपन और कश्मीर?

रूह कांप जाती है, ये सोचकर के अगर मेरा बचपन कश्मीर होता? शायद, मेरा आज कोई और शरीर होता! पैलेट से सुसज्जित, मेरा चेहरा होता, आख़िर, पत्थर मैंने भी उठाए हैं, फेंके भी हैं, बड़ा मासूम था मैं? गुस्सा तो था नहीं, न कोई परेशानी, बस कुछ होने की आसानी, जैसे एक खेल था, चलती हुई बस, एक पत्थर, सरकारी मुलाज़िमों की बस्ती, सुरक्षित हस्ती! आज मैं शांति-अमन हूँ, और वो बच्चे? जिनकी लोरी कदमताल है, और तलाशी, सुबह की लाली? जिनसे सवाल बन्दूकें करती हैं, और ज़वाब कोई भी सही नहीं! उनके हाथ के पत्थर क्या होंगे? सवाल? ज़वाब? बयान? मलाल? ख़याल?

क्या खेल खेलें कश्मीर के बच्चे?

आज बहुत मजबूर हूँ, कश्मीर से बहुत दूर हूँ, जैसे पेड़ खजूर हूँ, याद आ रहे हैं वो दिन, वो लोग जो इंसान थे, हमारी तरह, तुम्हारी तरह एक उम्दा मेज़बान की तरह, साथ हंसते थे, हम परेशान न हो, इसके लिए परेशां रहते थे, जब उनके साथ "खेल से मेल" किया, तो सब वैसे ही हँसे जोर जोर से, जैसे लोग बनारस में हँसे थे, या कंदमाल में, दिल्ली में, पुणे में, जुबा में, येंगॉन में पर उसके बाद जो बात हुई, तब उनके दर्द से मुलाक़ात हुई, "हमारा बचपन अँधेरे को बली था" अब हम अपने बच्चों को हंसाएंगे, वो हमारे शुक्रगुजार हुए, और हम, अपनी नज़रों में ज़रा कम गुनाहगार हुए, कश्मीर भारत को खूबसूरत है, और सारे देशभक्त, उसको कोठे पर बिठाना चाहते हैं, एक जगह है सबके लिए, जहां से डॉलर्स आते हैं, पाउंड, यूरो, और रूपये भी, कौन छोड़ता है ऐसे माल को, हर साल जो नयी हो जाती है, वर्जिन तैयार नथ उतरवाने को, कौन देखता हैं कि वहां इंसान हैं, उनके दिल हैं, उनकी जान है, उनके बच्चे हैं जो सरकार की गोली कुर्बान हैं! सफर ज़ारी था, आने जाने में, कश्मीरी दोस्त हमको लगे जगहों के बारे बताने...

भारत माँ के बच्चे -2

10साल का रामु कचरा चुनता है, किस एंगल से ये भगवान बनता है! 11 साल की लाजो को 2 साल का पप्पू संभालना है, ज़रा बताइये इनमें से किस के अंदर भगवान् होगा? 12 साल के नरेंदर को आज खाकी निक्कर मिला, अब उसको उम्र भर की नफ़रत सिखाई जायेगी! 13 साल की वसुन्धरा की आज सुहाग रात है, कुछ खेलों में बच्चो कि 'कच्ची' नहीं होती! 14 साल का 'श श, अबे इधर आ' टेबल साफ़ करता है, उसका नाम, चाय पीने वालों की तहज़ीब बन गया है! 15 साल की सीता आज से "A" हो गयी है, भारत माँ के साथ ज़बरजस्ती हो गयी है! 16 साल का शेख तडप रहा है प्लेटफ़ॉम पर, आज उसको 'व्हाट्नर' नहीं मिला सूंघने को! 17  साल की मंजु अब दिल्ली जायेगी, साहेब के बच्चों के बड़े काम आयेगी! 18 का हनुमंता चोरी करते पकड़ा गया, अब उसे ट्रेनिंग के लिये जुवेनाइल भेजा है! (बाल-अधिकार कानून के तहत १८ साल की उम्र तक आप बाल-अधिकार के दायरे में आते हैं। इस कानून को अंतरराष्ट्रिय मान्यता प्राप्त है। अगर आप संविधान मानते हैं तो आप ये भी देख सकते हैं कि भारत माँ के करोड़ों बच्चे अपने अधिकारों से वंचित हैं, पर हम म...

भारत माँ के बच्चे -1

पैदा होते ही सब को माथा पीटते देखा, दुखनी सिर्फ़ नाम है या सच की पहचान 1 साल का अभिमन्यू एक दिन में बड़ा हो गया पिताश्री की बाटली ले कर खड़ा हो गया! 2 साल की राजेश्वरी कैसे जाने वो गुड है या बेड गर्ल, क्यों आप आलू-प्याज़ की तरह बच्चों को तौलते हैं! 3 साल का जितेंदर झाड़-फूँक से साफ़ हो गया किसको सजा मिली और कौन मांफ हो गया?? 4 साल की बसंती को एक रोटी कम मिली, उस भाई के लिए जो उसे कभी बचाएगा!!! 5 साल के असोक का कहीं कुछ पता नहीं चला फुटपाथ पर तिरंगा बेचते बच्चे का नाम पूछा!?? 6 साल की रमणी डरती है जबरजस्ती के हाथों से, बेबी को देवी बना कोई गोद बिठाना चाहता है! 7 साल के मुन्ना को आज उसकी पहचान बताई गई, मास्टर जी डंडा से बोले, "नीची जात" "पढ़ोगे"? 8 साल का पिंटू घंटों होटल में बर्तन घिसता है, गौर से देखिये उसके अंदर भगवन बसता है!! 9साल की मुन्नी घर का झाड़ू-पोंछा करती है, कौन सी देवी है जिसकी आप पूजा करती हैं!

150 मुस्कानों का क़र्ज़!

बच्चे भी इंसान है, शायद इसलिए काम आसान है,  इंसाँ गुनहगार है, सजा का हकदार है, रुकती और चलती हुई, साँसों के परे जाके देखो, बच्चे तो 'हमेशा' के लिए हमारे दिलो-दिमाग में घर करेंगे, कोई शक? तो फिर कौन मर गया, क्या वो इंसाँ थे, ज़ाहिर है? वो बचपन भी कभी इंसाँ था, कहाँ खो गया, क्या हो गया? उस दौर के हम इंसाँ है, या बेजान निशाँ हैं? गम होगा, आँसु भी, मायूसी, कुछ जल रहा होगा, कुछ पल रहा होगा, बस एक ही गुज़ारिश है, सर झुका के, बंधे हाथों, आँखों में खून न आने दें, हम आप थोड़े बहुत कम ज्यादा इंसाँ अभी बाकी है, और जाहिर है नाकाफ़ी हैं, दुखी होइए, जी भर रोइये, बस हाथ खड़े मत करना, छलक रहे हैं घड़े, और मत भरना, चलो वक्त को आसाँ कर ले, आँखों में चुल्लू भर सपने भर लें, 150 मुस्कानों का क़र्ज़ है, बस इतना फ़र्ज़ कर लें, दुनिया में हँसी कम नही पड़ने देंगे, Smile Please! (हाल में लाहौर में चिल्ड्रनस लिटरेचर फ़ेस्टिवल में शिरकत करते समय जब हम बच्चों के साथ खेल रहे थे तब हमने एक गाने की लाईन "दिल्ली से मोरा भाई लायो रे बाजरा_ _ _ " को बदलकर ...

चलो मुस्कानों को बचाये

चलो आज ज़रा इन्साँ हो जायें,   ज़रा दिल को नफ़रत से बचायें! बस हुआ दो और दो का चार करना,  किसी के खून को हिसाब न बनायें, नहीं हो सकती मोहब्बत तुमसे कोई बात नहीं,  गुज़ारिश इतनी कि ज़रा आईने में देख मुस्करायें खून और अश्कों में फ़रक कब खत्म हुआ,  नादानों को नादानी के मायने कौन समझाये? ना कोई खुश होगा न सुकूँमंद ये यकीं है,  हाथ क्या आया ज़रा कोई हमको समझाये! यही आखिरी रास्ता है कैसे यकीं‌ आया? गुस्ताखी माफ़ हो प्लीज़ ज़रा गौर फ़रमायें आज नफ़रत-गुस्सा कितना आसाँ हुआ,  हो सके तो आज उस बाज़ार न जायें दिल पे हाथ रखें और महसूस करें, आज गरज है उम्मीदों की, न गवायें  please please please.....

बच्चे

बच्चे क्यों अपने या पराये होते हैं? रोज़ रोज़ बच्चे गायब होते हैं, रोज़ कितने नाज़ायज़ होते हैं, फ़िर क्यों पैदा होते हैं, कौन सी जरूरतों के जायज़ होते हैं! क्यों होते हैं दिखाने कि चीज़? अपना ही जरूरत का घर, कपड़ा, सामान, और अपने खून का बच्चा काम आसान! बच्चे हैं अपने या अपने अहं का शिकार हैं, नमक-मिर्ची स्वाद अनुसार घर का अचार हैं! क्या आप बच्चों के सलाहकार हैं, दोस्त, या उनके भविष्य-विधाता? बापगिरी, माँगिरी, दादागिरी, टीचरगिरी,आदर्शगिरी, कब मिलेगी बच्चों को खुली हवा की साँस फ़िरी! क्या आपको मालूम है अब हॉस्पिटल में पंड़ित बैठते है और मुहुर्त के हिसाब से लोग ऑपरेशन कराते हैं कि सही समय बच्चा पैदा हो! मुहूर्त पर पैदा करते हैं, बच्चों का मैदा करते हैं, कैसे इनको बड़ाएंगे, नमकीन बना के खायेंगे! बच्चे भगवान का रुप? क्या इससे घटिया मज़ाक कोई हो सकता है? पैदा हुए तब भगवान का रूप, लड़्की हुए तो बददुआ खूब, मज़बुरी हुई तो बाल मज़दूर, किस बात का है सभ्य गुरूर! दुनिया का बेइंतहा बेशरमपन, और हमारा बचपन,  पचपन बहाने आपके, और बलि एक मासूम सचपन!  बचपन किस चिड़िया का ना...

सोच की गड़बड़ या फ़क्त बड़बड़!

होर्न का तेवर मिनस्टर का फ़ेवर , ड़ॉवरी का वर , जिंदगी आपकी क्यों दूसरे ड्राईवर ' मर्द ' नाम है जात है नर , सत्यानाश दुनिया , जा मर ! कम उम्र में निकलते बच्चों के पर , जल्दी सीख गये गुटर - गूँ कबूतर , हाथ में मोबाईल पर कंधे पे सर ? क्या अपनी चाल पे है शीला आंटी का असर ? कहते हैं अपनी मर्ज़ी है , पर खबर नहीं कौन दर्ज़ी है , ज़ेब खर्च है और महंगाई अर्ज़ी है , किसको दोष दें सच्चाई फ़र्ज़ी है , घुटने में सर ड़ाल के पड़ो , ज़िंदगी जंग है , अपनों से लड़ो ? अभी बच्चे हो जरा बड़ो , रिश्ते खून होते हैं , दोस्त जुनून , सोचो मुसीबत में कौन सुकून , हमारे हाथ में नहीं कुछ , जो मरज़ी हुकूम ! दोस्ती छुप - छुप के करेंगे , जो हाथ आया उस पे मरेंगे , दोस्ती सौगात होती है , पर रिश्ता बने तो उसकी जात होती है , इज़्ज़त सिर्फ़ ताकत की लात होती है , वरिष्ठ , बुज़ूर्ग , बड़े सब चिकने घड़े , मान्यताओं मे अटके , परंपराओं में गड़े , छोटों की सच्चाई बेमानी है , हमने भी प्यार किया था . . . तेरी - मेरी माँ की . . ....