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ज़िन्दगी ख़ाक की!!

ज़िन्दगी दावत है, किसी को... बग़ावत है किसी की ? आदत है, किसी की मुश्किल, और कोई आसान, काम किसी का, नाम कोई बदनाम, मुफ़्त पहचान सरेआम, अकेले, भीड़ में, दौड़ रोज़ की, होड़, काहे? बेपरवाह, आगाह? अपने सफ़र से, दोस्ती, अजनबी मुसाफ़िर से, चलते रास्ते आपके, भांप के, नाप के किसी और के? किस छोर के? सहारे, या यकीन मंझदारे? सह रहे हैं या बह रहे हैं, ख़ामोश या कह रहे हैं? अपनी बात,  ज़िंदगी ज़ज़्बात, क्या परवा साख की? आखिर ज़िन्दगी ख़ाक की!!

काम आसान

  काम फकीरी का ज़रा आसान चाहिए, क्यों दुआ मांगे के सुख सामान चाहिए! क्यों लाउडस्पीकर पर भजन इबादत है नेमत बरस रही है आपको कान चाहिए! लॉटरी वाले का नाम भगवान चाहिए, मन्नत पूरी होना ज़रा आसान चाहिए! क्यों शोर मंदिर मस्ज़िद गिरजे में इतना है, इतना बस काफी नहीं की हम इंसान हैं! बस एक फ़िक्र की दोनों हाथ में लड्डू हों, और हाथ फैला के कहते भगवान चाहिए? क्यों हर काम आसान चाहिये, कोशिशों में ज़रा जान चाहिए!   बुरे कामों को नाम भगवान चाहिये, बगल में दबी छुरी को राम चाहिये! सब अपनी अपनी नीयत के इंसान हैं, सबको अपने हिस्से के भगवान चाहिये! खुदा बँट गये हैं तमाम मज़हबों में, सबको अपने हिस्से के इंसान चाहिये!