आज को आने की जल्दी पड़ी थी ताक लगाये थी, जिद्द पर अड़ी थी सुबह सुबह अब पांव पसारे पड़ी है, हम को जगा दिया, खुद सोयी पड़ी है! आज को कल होने की जल्दी पड़ी थी कतार लगाये लम्हॊं की भीड़ खड़ी थी मुंह छूपा के कितने लम्हे युँ ही गुजर गये जिद्द में खड़े कुछ आने से ही मुकर गये! कल को आस्तीन से झाड़ बैठे हैं, किसको खबर,कहां इसमें सांप बैठे हैं देखते हैं 'आज' क्या तेवर दिखाता है, हम भी अपनी चादर नाप बैठे हैं! आज को आस्तीन से झाड़ के बैठे हैं, फ़िक्र कहां कि जाम आये, इल्जाम आये आईना साथ में और ताड़ लगाये बैठे है मुमकिन है, कल कातिलॊं में नाम आये! आज़ को आस्तीन से झाड़ के बैठे हैं, कल के पन्ने अब पलटते हैं, कब कहां कौन सी बत्ती चमके उम्मीद के झाड़ से लटकते हैं! आज़ को आस्तीन से झाड़ के बैठे हैं, दिन भर गला फ़ाड़ के बैठे हैं टिप-टिप बारिश की आड़ में बैठे हैं मत कहना,बड़े लाड़ से बैठे हैं! आज को कल होने की जल्दी पड़ी थी कतार लगाये लम्हॊं की भीड़ खड़ी थी मुंह छूपा के कितने लम्हे युँ ही गुजर गये जिद्द में खड़े कुछ आने से ही मुकर गये!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।