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न होने में

सुबह खो गयी कहीं सुबह होने में,  वक़्त गुज़रा नहीं फिर क्यॊं शाम होने में? तमाम मुश्किलें मेरे गुमनाम होने में वो रास्ते चलुं जो गुजरे मेरे खोने में करवटें अकेली रह गयी कहीं कोने मैं, उम्र गुजरेगी ये भी वह रात होने मैं दुरियां बड़ती है कितनी नज़दीक होने में, खो रहे हैं रिश्ते उम्मीद होने में, आप भी शामिल हैं मेरे होने में, खो गये हैं कहीं मेरे होने में, गुम है हर एक, कुछ और होने में, जाने क्या मुश्किल अपना होने में छुपी सारी रातें दिन के कोनॊं में थके सपने बैठे-बैठे बिछोनॊं में !! मैं हुँ मसरुफ़, अपने अधुरे होने में  मोड़ चाहिये रास्ते को सफ़र होने में

तीन करवटें

कुछ नहीं न कोई आवाज़ न कोई अंदाज़ ख़ामोशी भी उदास ऐसा तो नहीं की तुम हो नहीं काम की एक लिस्ट है, कागज बिखरे हैं और बातें अधूरी रातें गुजर रही हैं दिन पलक झपकते मुकर जाते हैं चल रहे हैं पर खबर नहीं दूर जा रहे हैं या पहुँच रहे हैं हिसाब में कमजोर है या हम नज़र ही नहीं आते अकेले कभी गिनतियों में नहीं आते चहेरा देखते हैं या तस्वीर क्यों नहीं है थोडा और करीब? क़दमों के निशाँ मंजिल नहीं हैं गुजरे हैं हम इस से कहाँ इंकार हैं हम उमींदों के फकीर हैं गुजरे लम्हों से आजाद कोशिश तो है आवाज़ आप तक पहुँचती होगी दें तो भला न दे तो क्या खला घूम के फिर आयेंगे खोइये मत हम उम्मीद के फकीर हैं दोनो की पीठ है पर बेरुखी नहीं, न तल्खी, न बेपरवाई,  न रात दिन की भरपाई है,  न दिन रात की कमाई है,  ये बेफ़िकरी के मकाम,  मुसाफ़िरी के अंजाम,  सफ़र में हैं,  हम हमसफ़र हैं!

शुरुवात अधूरेपन की

आज एक और शुरुवात, अब और भी कुछ अधूरा होगा आपका साथ है तो कौन जाने किस करवट सबेरा होगा बात दिल कि क्यों किसी तक पहुँचाएं, जो मेरा है वो सच जरूर तेरा भी होगा! कहते हैं सदियों से कि दिया तले अंधेरा होगा, लाजिम है देखने वाली नज़रों को फ़ेरा होगा? मैं बस अपनी समझ का ठेका लूँगा इसमें क्या किसी से राय-मशवरा होगा? अपने कई अंदाज़ों से मैं भी अजनबी हूँ, दो मुलाकात में न सोचें एक सच पूरा होगा! अक्सर वो मुझे मेरी कमियाँ गिंनाते हैं, अधुरा करते हैं ये सोच के कि पूरा होगा! यूँ नहीं कि अपनी खामियों को अज्ञात हैं पर सफ़र में वो सामान नहीं मेरा होगा!