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गूंजती खामोशियाँ!

सब खामोश हैं कोई सुन नहीं सकता? दर्द सारे मज़हबी रंगों में बिकने लगे हैं! बेख़बर अपने खंजरों से, इतने मासूम हैं सारे दोष शिकार के, ऐसे गुनहगार हैं!  किस किस क़त्ल पर भगवान का नाम है, बस एक मत्था टेका के सौ खून माफ हैं! इतनी चुप्पी है या कान के पर्दे फट गए? इतने घिनौने सच, सब धर्म जात में बंट गए! नफ़रत माफ, झूठ माफ, सरेआम कत्ल माफ़? अपने धर्म की शिक्षा सबको कितनी साफ है! घर बैठे हर एक गुनाह की वकालत करते हैं, आंखों पर पट्टी बांध सब इबादत करते हैं! अपनी कमियों ने कितना कमजोर किया है,  इलाज़ ये कि किस किस को दोष दिया है? यूँ नहीं की शहर के सारे आईने ख़ामोश हैं!  किसके हाथों बिक रहे हैं, ये किसको होश है? ज़ुल्मतों की कमी नहीं, और रोशनी कातिल है, किसको इल्ज़ाम दे के अपने ही सब शामिल हैं! (ज़ुल्मतें - अँधेरे)

सज़ा-ए-मौत!

ताज़ीराते हिंद कहती है सज़ा - ए - मौत है , एक मरता है या इंसानियत की मौत है ? शराफ़त का नया धंधा वसूली है , गुनाह मोटा है कहते हैं सूली है , हाथ अपने खड़े हैं, पर किसी और को फ़ाँसी है , एक ताकत को सज़ा है और, एक को माफ़ी है ? कहते हैं सबक सिखाना जरूरी है , कौन सी शिक्षा रह गयी अधुरी है '? लगता है जैसे कोई मज़बूरी है , फ़िर क्यों इंसा होना जरूरी है ? सुधार नहीं सकते तो सिधार तो , कर्ज़ भारी है जिंदगी उधार लो ! ड़र मौत का रोक देगा गुनहगार को , जैसे रेड़ लाईट रोकती है कार को ? सारे तज़ुर्बे यहीं के , सारी सोच यहीं से , अब कटघरे खड़ी है क्यों नहीं देखते फ़ैसला देने वालों  हैवानियत यहीं पली बड़ी है ?