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क्या गुनिए, क्या गुनगुनाइए!

गोली मारो कहबे, मूरख सोच के नेता चुनिए सहनशील संस्कृति बीरों की कथनी सुनिए! कथनी के सब बीर, कही अनसुनी करिए, बातों के तीर बचने, चलीं अब बहरा बनिए! बातों के सब तीर, मलहम का कर बनिए फिसली हुई जबान जालिम कहिये-सुनिए कहिये-सुनिए सबकी, पर यूँ ना गुनिये काँटों का, का दोस् ,जीवन आप जो बुनिए? बुनिए जीवन ऐसा जिसमें जगह हो सारी, मैं, मेरा, मुझसे की न लगने पाए बीमारी! लगे बीमारी ऐसी तो पूरी उमर सताए, अपनी ही तस्वीर सजाने तू वक्त गवाए! वक्त गवाएं सारा के बने गोरा-सुंदर क्रीम बेचते मदारी बने कौन है बंदर? बंदर बने बली के, हैं छुरी में धार लगाते, मुंह में इनके राम, पीठ पर छुरी चलाते! छुरी पीठ पर जैसे बनी सरकारी नीति, मिट्टी पैरों के नीचे के बनी है रेती! रेत बन गए सपने सब हाथों से छूटे? टूट गए हैं कितने, कितने खुद से झूठे! खुद से झूठ बोल रहे उनको क्या समझाएं, कहाँ आगयी दुनिया और कहाँ अब जाए?

कल आज और कल!

आज को आने की जल्दी पड़ी थी ताक लगाये थी, जिद्द पर अड़ी थी सुबह सुबह अब पांव पसारे पड़ी है, हम को जगा दिया, खुद सोयी पड़ी है! आज को कल होने की जल्दी पड़ी थी कतार लगाये लम्हॊं की भीड़ खड़ी थी मुंह छूपा के कितने लम्हे युँ ही गुजर गये जिद्द में खड़े कुछ आने से ही मुकर गये! कल को आस्तीन से झाड़ बैठे हैं, किसको खबर,कहां इसमें सांप बैठे हैं देखते हैं 'आज' क्या तेवर दिखाता है, हम भी अपनी चादर नाप बैठे हैं! आज को आस्तीन से झाड़ के बैठे हैं, फ़िक्र कहां कि जाम आये, इल्जाम आये आईना साथ में और ताड़ लगाये बैठे है मुमकिन है, कल कातिलॊं में नाम आये! आज़ को आस्तीन से झाड़ के बैठे हैं, कल के पन्ने अब पलटते हैं, कब कहां कौन सी बत्ती चमके उम्मीद के झाड़ से लटकते हैं! आज़ को आस्तीन से झाड़ के बैठे हैं, दिन भर गला फ़ाड़ के बैठे हैं टिप-टिप बारिश की आड़ में बैठे हैं मत कहना,बड़े लाड़ से बैठे हैं! आज को कल होने की जल्दी पड़ी थी कतार लगाये लम्हॊं की भीड़ खड़ी थी मुंह छूपा के कितने लम्हे युँ ही गुजर गये जिद्द में खड़े कुछ आने से ही मुकर गये!