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जमीनी बातें!

जब जमीं मकां होती है तो जश्न होता है मकान के जमीं होने पर क्यों अश्क होता है मेरे पैर ज़मीन हैं, कितने नुक्ताचीन हैं, खाते हैं दर ठोकरें फ़िर भी यकीन है! खासे आसमान हैं, रंगों में कितनी जान है! उड़ रहे हैं वो जिनको हांसिल आसान है! जमीं को भी भरोसा है, पैर भी यकीन हैं, आज़ाद है अधूरे दोनो, और पूरे अधीन हैं! मीठे हैं कहीं पर हम और कहीं नमकीन हैं, ज़मीन से हैं सच या सच से यूँ ज़मीन है? उड़ गए वो जिनको परों को कम यकीन है! कैसे समझें पैरों को ज़ंजीर नहीं जमीन है! ज़मीन जड़ है, दीवार नहीं ओ आसमाँ छत, फिर भी अटके हैं सब नाप मीटर,फीट,गज!!

रास्ते अनकहे!

रास्ते, चलते हुए, यहां-वहां जहां-तहां हर ओर से निकलते हुए, हर लम्हा, एक एक पल हमसफ़र बनने तैयार, आप कहाँ अकेले हैं? सफ़र में? "ट्रस्ट द प्रोसेस" रास्ते किसी को रोकते नहीं, कभी टोकते नहीं, 'नज़र नहीं आते?' आप कदम क्यों नहीं उठाते, फिर कहिए, क्यों? मेरे पैरों के नीचे नहीं आते? क्यों अपने शक आज़माते हैं? शक नए रास्तों से घबराते हैं! अपने कदमों को अपना यकीन कीजे, आसमाँ-अरमान को जमीन कीजे, मुमकिन? .....सफ़र में Swati साथ☺️

यकीं यूँ कि. . . !

वो भी अज़नबी था और तू भी अज़नबी है, तख्त पलटा भी है या ये झूठा यकीं है? यकीं का खुदा कौन हो, यकीं को जमीं कौन हो अज़नबी का यकीं करें फ़िर अज़नबी कौन हो? तमाम यकीं है और युँ ही तमाम होते हैं, आँखें बंद है और उम्मीदों पे जवाँ होते है! तख्त की बात करके क्यों अज़नबी करते हैं, दिल में रखिये दिल का ही यकीं करते हैं! अपने पर ही यकीं रखिये लंबे साथ आयेगा, पैर फ़िसले भी तो दूसरे का नाम नहीं आयेगा! इतना कीजे यकीं कि उसको भी आ जाये लड़खड़ाते पैरों को जैसे जमीन आ जाये! रंग आसमां के जमीं के, थोड़े कुछ आपके यकीं के नज़र बायें करिये ज़रा, रंग और भी हैं जिंदगी के! अब ये ना कहिये कि बेवजह नुक्ताचीनि करते हैं, नमक आपका है, हम बस जरा नमकीं करते हैं!

बेदखल !

अपने ही घर से निकाले गए कहता है अब तक पाले गए जैसा था सांचा ढाले गए हम कहाँ वक्त के हवाले गए  झूट के जाल में जाले गए हर सच पर अपने सवाले गए अपने हाथों के निवाले गए उनके हाथों में प्याले गए कैसे ये आँखों को जाले गए सारे उसूलों को लाले गए रस्ता दिखे यूँ उजाले किये उसने दरवाजों को ताले किये [कई कई साल पहले, लोगों के छोटे दिल और सिकुड़े हुए दिमाग से प्रभावित होकर रचित]

राम, शमशान और बदलते रस्ते !!

खुद को आज कुछ रुका हुआ पाते हैं, कौन जाने यहां से रास्ते कहां जाते हैं!  मुश्किलों को कंधे पे ले कर रामनाम करते हैं, क्यों आप अपनी दुआओं को शमशान करते हैं! ये अभी अभी की बात है, या पहले कि कोई रात है, अब अजनबी से क्या कहें, ये अजनबी से बात है! उस दौर से गुजरते हैं, कि उसुलों को फ़िज़ूल करते हैं, जिस जमीं पर खड़े हैं कीमत उसीसे वसुल करते हैं! बात पुरानी ही सही, तारीख बदल चुकी है, समझ बारिख है, गुमां है, रस्ते बदल चुकी है ये भी एक पहचान है, खुद से ही अंजान है लिये बोझ कुछ होने का, खालीपन सामान है! उड़ने का जिगर है, क्या पुछें उड़ना किधर है, हवा का रुख एक जाल है, या कोई सवाल हैं? क्यों रस्ते भटकना, सफ़र को हमसफ़र कीजे, जो अक्स यकीं में उस को ही असर कीजे! सच सब तरफ़ मौज़ुद है उसकी क्या तलाश, नज़र होगी आपकी जो दिख रही है लाश!

इमरोज़

बड़े कायदे से एक कायदा तोड़ दिया, दुनिया को सरेआम गुमराह छोड़ दिया! कहें वो जो कहते हैं, यही होता आया है, समाज़ सदियों से यूँ ही सोता आया है! मर्ज़ी थी सो हमने कर दिया मन-माफ़िक पहले भी ये इल्ज़ाम अपने सर आया है! दुनिया हमारे कदमों में कभी भी नहीं थी, कुछ अपनों से आज़ ये पैगाम आया है!  बड़ी बेमुरव्वत निकली मोहब्बत अपनों की,  कहाँ  दुआओं में आज अपना नाम आया है? मुश्किलों में कब हमने अपना साथ छोड़ा ये अपनापन ही अपने बड़े काम आया है, कोई भी अकेला नहीं है इस सफ़र में, फ़िर क्यों रास्तों पर इल्ज़ाम आया है?  अरसे से एक दुआ थी जो कबूल हो गयी,  क्यों किसी ज़ुबान पर काफ़िर नाम आया है!  इल्ज़ाम लगते हैं बहक गये हैं हम बेखुदी में युँ तो आज ही हाथों मे अपने जाम आया है! (इमरोज़ ने सितम्बर २००० में‌ हैदराबाद ऑल्ड़ सिटी में एक अंतराष्ट्ईय संस्था प्ले फ़ॉर पीस में एक वॉल्टीयर का काम शुरु किया था, 16 साल की उमर में, आज वो अमेरिका में प्ले फ़ॉर पीस की ऑपरेशन मैनेजर हैं और कोस्टारिका की UN पीस युनिवर्सिटी से Masters कर रही हैं!)

काले सच

सुरज की गर्मी से जल कर काले बादल सफ़ेद हो गये, सच के मान्यताओं से मतभेद हो गये हर चीज़ जल कर राख नहीं होती मिट्टी में मिलने से दुनिया खाक नहीं होती सारी शैतानियां लाख नहीं होती लाख कोशिशें दिमाग की, यकीं बिना दिल पर छायी धुँध साफ़ नहीं होती, पेड़ आसमान छू रहे हैं, और पंछी फ़िर भी, लाख कोशिश, दूरियां कम नहीं होती,  अब इसे उड़ान कहें, या  सोच की थकान, आप कहां पहुंचेंगे, कब होंगे, दूरियों के उस ओर, ये इस बात से तय होगा कि  आप अपने रास्तों से चल रहे हैं या अपने रास्तों में पल रहे हैं, तस्वीर आपकी नज़र है, या,  हर अंजाने मोड़ पर आप हाथ मल रहे हैं, प्रक्रिति की दीवारें, कल से,  काल से सीधी खड़ी हैं,  अपने पैरों तले बहती, नदी को छोटा करते,  पर  जब ढहती हैं, तो ऐसे बहती हैं जैसे यही सत्य है, खोना ही होना है, एक अगर आप अब भी खड़े है, क्योंकि घुटनों में बल है, तो सोच लीजिये, क्या ये छल है? जो सच है वो घुटनों के बल है!  (सुरज की आंकाक्षा और बादलों के खुलेपन, विनम्र नदिओं के इरादे और खिसकत...