सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

earth लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एलिमेंट्स

  कोई लड़ाई नहीं है, हवा पानी पहाड़ में, जमीन आसमान में, आग और पानी में? पानी बुझा देता है, आग उड़ा देती है आपको लगता है ये लड़ाई है? खासी तंग सोच पाई है! यही सोच तहज़ीब बनी है, तरक्की का बीज बनी है, पीछे छोड़ देना, आगे जाने की शर्त है, ये कैसी यही कवायद है? आखिर सीखा क्या हमने, कुदरत से? पानी और आग की दोस्ती? जब साथ आते हैं,  हवा हो जाते हैं! हवा और पानी  जमीन की सवारी हैं, सदियों से ये सफर जारी है! कोई किसी से कम नहीं, न कोई किसी पर भारी! हर कोई वजह है,  जगह नहीं, पानी, हवा, आग, जमीन, कायनात के कलाकार हैं, कई प्रकार है, तमाम आकार हैं, और जहां जरूरी हो, शून्य, सिफर होने तैयार हैं! बड़ा छोटा, कम ज्यादा, आगे पीछे, ऊपर नीचे इस द्वंद, इस जंग में फंसे आप कब इन कलाकार से सीखेंगे??

जमीनी बातें!

जब जमीं मकां होती है तो जश्न होता है मकान के जमीं होने पर क्यों अश्क होता है मेरे पैर ज़मीन हैं, कितने नुक्ताचीन हैं, खाते हैं दर ठोकरें फ़िर भी यकीन है! खासे आसमान हैं, रंगों में कितनी जान है! उड़ रहे हैं वो जिनको हांसिल आसान है! जमीं को भी भरोसा है, पैर भी यकीन हैं, आज़ाद है अधूरे दोनो, और पूरे अधीन हैं! मीठे हैं कहीं पर हम और कहीं नमकीन हैं, ज़मीन से हैं सच या सच से यूँ ज़मीन है? उड़ गए वो जिनको परों को कम यकीन है! कैसे समझें पैरों को ज़ंजीर नहीं जमीन है! ज़मीन जड़ है, दीवार नहीं ओ आसमाँ छत, फिर भी अटके हैं सब नाप मीटर,फीट,गज!!

नीलिमा

दो अंतहीन बादल और उनके बीच नीले आसमान का कतरा इतनी नीलिमा इतनी स्वछंद कोमल और पिघलती कुछ ही लम्हों में घुल जायेगी जैसे कभी थी ही नहीं! वो नीलिमा फ़िर कभी नज़र नहीं आयेगी क्या तुमने उससे रिश्ता नहीं जोड़ा . . .? (जिद्दू क्रष्नमूर्ती की चहलकदमी और उस दौरान आये विचारॊं का काव्यअनुवाद )

सौदे सफ़र के!

अपने मज़हब के हम यूँ ही यकीं हो गये, संज़ीदगी के अपनी ही शौकिन हो गये, आसमां अपने सारे जमीन हो गये दिल में डुबो हाथ, देखिये रंगीं हो गये हाथ रंगने को मिट्टी बहुत है, फिर भी लोग खून लाल करते हैं मौत कोई बीमारी नहीं है, काहे फ़िर मुर्ख इलाज़ करते हैं आसमां क्यों लोगोँ के मज़हब बनते हैं, क्यों गुमराह लोग रास्तों को करते हैं अपने ही हाथ आते मुकरते हैं, क्यों सफ़र छोटा करने को कुतरते हैं रास्ते के कंकड़ सब, मील का पत्थर हुए, जो रुक गये उनके सारे घर हुए! पर मुसाफ़िर इस हलचल से अंजान है, सारे घरों का सराय नाम है !  कहने को तो दुनिया सराय है,   समय रहते आये तो चाय है,  जिद्द है आपकी घर बनाए हैं,  घांस को गधा है कि गाय है! मान लो, जान लो, पहचान लो, कोशिश सबकी यही की सच को आसान लो पर दो पल बदलती दुनिया में, मुमकिन नहीं कि आज को कल मान लो!