सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

सियासत लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सियासत तमाम!

सियासत जुल्म है, हुक्मरान कातिल, शिक़ायत करें, किससे, क्या हांसिल! बड़ी कारोबारी सरकार है, मज़हब इसका व्यापार है। वो सरकार जिसका मज़हबी सरोकार है, सोचा जाए तो मानसिक रूप से बीमार है! सरकार धर्म की ठेकेदार बनी है, छाँट-बांट -काट की नीति चुनी है! आज कल ताज़ा खबर है, नफरत सियासत का घर है! इंसानियत की क्यों सरहदें हैं? हैवानियत क्यों सरकार हुई है?  मौत सरकार हो गयी है, बड़ा कारोबार हो गई है!!  इंसाफ़ कटघरे में खड़ा है, सियासत चिकना घड़ा है! गायगर्दी कीजिए, सरकारी काम है, गुनाहगारों को अब रामनाम है!!

बाअदब, बामुलाहिज़ा, होशियार

चलने के नये रास्ते इज़ाद होते हैं, घुटनों पर चल लोग आबाद होते हैं तालीम बरसों की आखिरकार रंग लायी है हुक्मउदूली एक कला बन सामने आयी है! वतनपरस्ती फ़िर एक धारदार हथियार है, आप की मर्ज़ी अब सियासी कारोबार है! खुली हवा भी अब एक व्यापार है, हर वीक-एंड़ इसका कारोबार है! रस्ते साफ़ हो रहे हैं लकीरें मिटाने को कत्ल माफ़ हैं अब नये सच जुटाने को जो गुम हैं वो अब गुमशुदा नहीं होते, भटके हुए अब रस्ते नहीं खोते! एकता में सुना बड़ी ताकत होती है,  और ये भी कि ताकत बहका देती है! बाअदब, बामुलाहिज़ा, होशियार, अच्छे दिन आ रहे हैं! हम सब एक हैं, अब भारत स्वच्छ होगा भारत माता के जय, विजय, राम, नरिनदर बेटियाँ अच्छी घर के अंदर हकीकत तारीख बन रही है  और तारीख की हकीकत बदलती है,  सियासी गिरगिट है गोया बदलते रुख से रंग बदलती है!

गुठली के दाम!

राम का नाम, मासूमों की जान, सियासत तमाम, शरीफ़ों की ख़ामोशी,  समझदारों की तकरीर, ज़ाहिल तालीम, और तजुर्बों की ज़हालत, बेड़ा-गर्क है मियाँ और इरादों की वकालत? धोका खाने का उतना गम नहीं जो इस एहसास का, कि हम आदमी आम निकले! भगवान के नाम पर दे दो अपने वोट! सियासत में भिखारी तमाम निकले!! जितने थे सरपरस्त सब हराम निकले!  कोई नहीं जिसके मुंह 'हे राम' निकले !! सियासी दंगलो के अब नए सामान निकले!  कहीं राम निकले तो कहीं कुरान निकले!!  भक्तों ने तेरे तुझे ही गलत साबित किया!  छुरा भोंक कर देखा, कहाँ पर राम निकले!! जिसने खुदा का नाम बदला उसको मारा! हे भगवन, तेरे भक्त बड़े  शैतान निकले!!  जरुरत पड़ गयी तो दोस्ती का वास्ता! फिर मिलेंगे जब कोई काम निकले !! साथ है, तो हाथ तुमको, क्यों कर जरुरी है! कोई सौदा है आम, कि गुठली के दाम निकले? कोई नयी बात नहीं, तरह तरह के राम निकले! हर युग में सीता की बस यूँ ही जान निकले!! (मंदिर मस्जिद के प्रेमी व्यापारिओं से परेशां हो कर  बाबरी कांड और उसके बाद...