सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

जीवन लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पनपने के सच - बचपन

बचपन पनपता है, जवानी मचलती है, बुढापा ठहरता है! चलो बचपन पर लौट चलें, जम कर, जोश से, फूलें–फलें! अपना ही रास्ता बनें, बुनें! खिलना है, खुलना है, तमाम सच बदलना है हाल के, हालात के, उनसे जुड़े सवालात के, नज़रअंदाज़ जज़्बात के! पूछ लें वो सब सवाल जो डरे हुए है, क्योंकि बड़ों के जमीर मरे हुए हैं! उठा लें वो कदम जिसके नीचे की जमीन मालूम नहीं है, रास्ते ऐसे ही बनते हैं! आ जाएं साथ,  वही है बचपन की बात, कहां उसमें, दूसरे को कम करती मज़हब और जात? पनपना, फक्त जिंदा रहना नहीं है, बचपन की चाल चलिए खिलिए, खुलिए,  मिलिए हर पल से ऐसे जैसे ये पहली बार है, खेलिए, नौसिखिए बन, कुछ गलत नहीं, सब सीखने के नुस्खे हैं! दिल बचपन करिए, ज़िंदगी में जरा सचपन कीजिए! कोई द्वेष नहीं, घृणा नहीं, सब खेल हैं, मिलने के, दुनिया से,  उमंग से, चहकते हुए, साथ को बहकते हुए, जब तक है, तब है सौ फीसदी ! फिर कुछ और, या कुछ नहीं! न अपेक्षा , न उपेक्षा चलिए बचपन चलें?

इंसानी प्रकृति!

आपसी रिश्ते सिर्फ़ इंसान से रिश्तों से खून के जातीय मकान से खरीदे सामान से पसंदीदा पकवान से पालतू जानवर , या धर्म की मानकर और धरती से ? जिसके उपर सब खडे हैं ! क्या हम सब चिकने घडे हैं ? कहां वो शुरुवात हुई , जो आखिर हमारी मात हुई ? एक अलग ईंसानी जात हुई बुद्धि , विवेक , संवेदना की बात हुई ? और फ़िर लगे जंगल कटने , जानवर जंगली बन गए , संरक्षित , जो बचे हैं , हमारी दयामाया से , क्या है हमारी प्रकृति ? हरियाली से हमारा क्या रिश्ता है ? या वो सिर्फ़ एक चीज़ है , बाज़ार की दुनिया वाली , इस्केवर फ़ीट के दाम वाली , या छुट्टिंओं वाली , हमारे ज़िंदगी के हसीन पलों की , याद दिलाने वाली , तस्वीरों की पॄष्ठभूमि ? धरती को माता कहते हैं , इसे तो नाता कहते हैं ! इंसानी दुनिया को पालने - पोसने वाली , फ़िर क्यों ये हाल है ? क्यों प्रकृति बेहाल है ? भूकंप , सुनामी , सायक्लोन , ज्वालामुखी , जंगल जंगल आग कहीं ये जज़्बात तो नहीं ?

धीरे धीरे ... और खत्म?

 आप धीरे धीरे खत्म होते जाते हैं, अगर आप सफ़र को नहीं जाते हैं, अगर आप कुछ बांचते नहीं, ज़िंदगी को उसकी आवाजों से भांजते नहीं, आईनों में अपनी तस्वीर को मांजते नहीं  आप धीरे धीरे अंत हो जाते हैं, जब आप अपनी मान्यता मारते हैं अपनी तरफ़ बड़े हाथों को नकारते हैं, आप धीरे धीरे खत्म हो जाते हैं, अगर आप आदतों से अपने को बांधते हैं, रोज वही लकीर पीटते हैं - रोज के सधे हुए दिन को साधते हैं, अगर आप नये रंगो को नहीं पहनते, किसी नये को नहीं चीनते, आप धीरे धीरे काफ़ूर हुए जाते हैं, अगर आप दीवानेपन से कतराते हैं, और उसकी रवानगी से, जो आपकी आँखों को नम करती है, दिल की धड़कनों को चरम करती है,  आप धीरे धीरे नासूर हुए जाते हैं अगर आप अपनी ज़िंदगी नहीं बदलते उस वक्त ज़ब आपको, आपका काम नहीं चलता, रिश्ते में दिल नहीं पलता और आपको अपना माहौल नहीं फ़लता अगर आप अपनी यकीनी को जोखिम नही सिखाते, उसके लिये जिसका कोई ठिकाना नहीं, अगर आप किसी सपने का साथ नहीं देते, अगर आप ज़िंदगी में कम से कम एक बार, अपने को ये इज़ाज़त नहीं देते, कि भाग खड़ॆ हो नेक नसीहतों से - पा...

सोती सभ्यता!

खोज, शोध, अविष्कार, तलाश परिपक्व, पुर्ण, सम्पुर्ण तक पहुँचने का विचार जीवन का अर्थ पाने के लिये, जीवन का तिरस्कार? कमजोरियॊं को अलग कर, पुर्णता पाने का प्रयास? पर सोचो! बिना अंधकार प्रकाश का क्या अर्थ मृत्यू नहीं तो कौन तलाशेगा, जीवन-अर्थ सरल सा विचार है,  Nothing is Perfect अर्थ?  कुछ भी पुर्ण नहीं, परिपक्व नहीं अनर्थ समझ-समझ की बात है! प्रकृति के साथ हमारी दौड़ में प्रकृति को पीछे छोड़ने की होड़ में ज्ञान के अंहकार में कहीं हम सब कुछ नज़रअंदाज़ तो नहीं‌ कर रहे ? इस तेज़ रफ्तार जिंदगी में हम कुछ ज्यादा आगे तो नहीं‌ निकल आये? जरा पीछे जायें! पुरानी कहावत है “जो बोओगे, वही काटोगे" पर आज कल गंगा उल्टी बह रही है हम ने काट लिया है अब बो रहे हैं ऐसा नही लगता ___? हम इस सभ्यता में भी सो रहे हैं?