जमीं नहीं रही अपनी, पैर टूट गए, रहसह के बस मेरे पंख छूट गए! उड़ने के सिवा अब चारा नहीं, इस तरह वो मेरे रास्ते लूट गए! खून से अपने ही महक आती है, नफ़रत को सब, अपने जुट गए! बस एक रंग में सब बातें करनी हैं, मेरे आंगन के सारे मौसम उठ गए! कौन कहता है कि दुनिया मेरी हो, लाइब्रेरी से वो शब्दकोश हट गए! मेरे तुम्हारे अब हमारे नहीं रहे, यूं रिश्तों में मायने सिमट गए! सब के सच अब अलग अलग हैं, ये बोल सब महफिल से उठ गए!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।