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दावत-ए-ज़िन्दगी!

जिस्मो-जहां की ठरक ठरक ले चल ए दिल किसी और तरफ! सुबह-शाम का कोई फरक, लम्हे चढ़ें सर सरक सरक! नहीं उतरे कोई बात हलक, मेरी दुनिया कोई और फलक! एक सुट्टा और एक जाम अरक, किसको परवा वो क्या है अदब! गले लगने ओ गले पड़ने के फरख, अहमक तहजीबों के कैसे वरक़! अंदाज़ आपके वो लहज़ा-ओ-लहक, इंकलाब इतना के जाये दौर बहक! ज़िंदा हैं सब अरमानों की महक, दावत-ए-ज़िन्दगी बहक बहक!

जलदी ही!

जलदी ही! अकेले लेटे हुए खाली हाथ, अकेले सरहाने, तुम्हारा ख्याल, संगी, रात, आसामाँ भक्क खुली आँखें अंधेरों को खिसकते हुए देखतीं, तुम नहीं हो रोज़ाना, ढूंढता हूँ, 'आनंद'  सांसारिक और सात्विक  समझा, साथ ....साथी  तुम आनंदित हो, (बगैर मेरे) मेरी दुर्दशा है, पिघलो मत, ये आह (तुम तक पहुंचेगी, कहाँ?) लाईट ऑफ़, दरवाज़ा अड़काया है, कदमों का आसार है, मेरी बाँहों को इंतज़ार है! (आनंद द्वारा रचित मूलरचना "Soon" को हिंदी में व्यक्त करने की कोशिश )

कुछ तो बात होगी!

आवाज़ चीख बन जाये, उम्मीद भीख बन जाये  ऐसी जिंदगी से लड़ना क्या, जो लम्हों की टीस बन जाये सपने हैं अरमान नहीं, ऐसे सफर आसान नहीं सच्चाइयाँ रस्ते में है इस से हम अनजान नहीं!   पुरे कभी हो जाएँ , ऐसे कोई काम नहीं फुर्सत में सोचेंगे, अब ऐसे आराम नहीं ! उस मोड पर नहीं की रास्ते बुन लें चले हैं जिस पर उसी को गुन लें अपने ही चेहरे को पीठ दिखाते हैं  कभी कभी यूँ भी हम सामने आते हैं आसमान भी यकीन है, जमीं भी यकीं रास्ता ढूंढते हैं जो मिला दे कहीं   कुछ ती बात होगी नजर नहीं आती आँखों से मेरे दीवारें नहीं जातीं क्यूँ  हर ओर अंधेरा नज़र आता है, आँखों में ना-उम्मीदी का असर आता है!