चलते हैं उस रास्ते जो खत्म नहीं होते, चोट लगती है हमें पर जख्म नहीं होते! महबूब की तमाम मुश्किलें हम से हैं हम से ही कहते हैं काश! हम नहीं होते आदतों से मजबूर अब वो नहीं होते रात-दिन, शामों-सहर अब हम नहीं होते नींद में तडपकर हाथ थाम लेते हैं, ख्वाबों में उनके, क्या हम नहीं होते? कितनी गर्दिशें झेली हैं तो खुद को समझा है ओर कोई होता, तो बेशक! हम नहीं होते मतलब निकलता है तब तक साथ सबका है मुश्किलों में तो गोया हम, हम नहीं होते! मोहब्बत में उनकी अब भी वोही ज़ज्बा है, बाँहों में उनकी पर अब हम नहीं होते
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।