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हम लोग!

  रीढ़ की हड्डी पहले ही नम थी, अब ऑक्सीजन भी कम है! जो बोया वही काटते हैं, आख़िर किस बात का गम है? सच का सामना हुआ अब, तो मन की बात झूठ लगती है? अब पछतावत होत का, नफ़रत ऐसे ही फलती फूलती है! जो नज़र ही न आए, वो सच है के झूठ? भक्ति का काम है जपें "बहुत खूब, बहुत खूब"! मरने वाले सब लाश हो गए, ज़िंदा हैं जो काश हो गए, ध्यान से सुनिए खबर, सच सब सत्यानाश हो गए! अच्छों अच्छों के पाप धुले हैं,  डुबकी लो बस आप भले हैं! उनके गुनाह नहीं गिनते मूरख,  जो गाय दूध-मूत धुले हैं! कुम्भ_करन को सब जाएं,  करमकांड को करम बनायें, भक्ति मोह-माया बन गई,  एक दुजे से होड़ लगाएं!   

भीड़ भेड़ भगवान!

  भीड़ भगवान हो गई है, तीर्थस्थान हो गई है, कुंभ का स्नान हो गई है, मोक्ष का सामान हो गई है, स्टेशन बैठे चार धाम हो गई है! किस ने सोचा था? ये दिन भी आयेगा, बराबरी की लड़ाई, ऐसी टु के कोच लड़ी जाएगी, जिसकी लाठी उसकी सीट हो जाएगी, हक की बात इतनी आसान हो जाएगी, भीड़ ही संविधान हो जाएगी! कुंभ जाने की ये विधि  विधान हो जाएगी! सब एक हो गए हैं, एक संदेश, एक दिशा (भ्रम), मंदिर वहीं बनायेंगे, मस्जिद वहीं गिराएंगे, उसी मुहूर्त नहाएंगे, करोड़ों की भीड़ बनेंगे, सब भेड़ हों जाएंगे!

जिंदगी ज़हर!

जिंदगी ज़हर है इसलिए रोज़ पीते हैं, नकाबिल दर्द कोई, (ये)कैसा असर होता है? मौत के काबिल नहीं इसलिए जीते हैं, कौन कमबख्त जीने के लिए जीता है! चलों मुस्कुराएं, गले मिलें, मिले जुलें, यूं जिंदा रहने का तमाशा हमें आता है! नफ़रत से मोहब्बत का दौर चला है, पूजा का तौर "हे राम" हुआ जाता है! हमसे नहीं होती वक्त की मुलाज़िमी, सुबह शाम कहां हमको यकीं होता है? चलती-फिरती लाशें हैं चारों तरफ़, सांस चलने से झूठा गुमान होता है! नेक इरादों का बाज़ार बन गई दुनिया, इसी पैग़ाम का सब इश्तहार होता है! हवा ज़हर हुई है पानी हुआ जाता है, डेवलपमेंट का ये मानी हुआ जा ता है।

हम काफ़िर!

हम काफ़िर हैं झूठे यकीनों के, दीवारों में चुनने के काबिल हैं क्या? अकीदत और इबादत के गैर हैं हम, आपकी दुआओं से खैर हैं क्या? सजदा करें इतनी अना नहीं हममें,  ख़ाक से पूछिए ख़ाकसार है क्या? अपने गुनाहों को गंगा नहीं करते, जो एहसास न हो वो वजन है क्या? "जय श्री" जोश में कत्ल कर दें कोई आप ऐसे कोई अवतार हैं क्या? भक्त भीड़ बन गए हैं तमाशों की, सारे अकेलों की कहीं भीड़ है क्या? हम मुसाफिर हैं तलाश तख़ल्लुस है, ज़िंदगी मज़हब के वास्ते है क्या?

हमारी दुनिया_दारी, दुकानदारी!

हमारी  दुनिया, हमारे लोग हमारा घर हमारा परिवार हमारे साथी हमारा समुदाय हमारी दुनिया मेरा घर   तुम्हारा घर मेरे लोग तुम्हारे लोग मेरा परिवार तुम्हारा परिवार मेरे साथी तुम्हारे साथी मेरे बच्चे तुम्हारे बच्चे मेरी औरतें तुम्हारी औरतें मेरी इज्जत तुम्हारी इज्जत मेरा समुदाय तुम्हारा समुदाय मेरी ताकत तुम्हारी कमजोरी तुम्हारी ताकत मेरी कमजोरी मेरी बंदूक तुम्हारी बंदूक मेरी लड़ाई मेरी जीत तुम्हारी हार मेरी जीत   तुम्हारी जीत मेरी हार   तुम्हारा नुकसान मेरा फायदा मेरा नुकसान तुम्हारा फायदा तुम्हारी बर्बादी, मेरी ...? मेरी जीत? मेरी जीत मेरी हार! बिखरा समुदाय टूटे घर भूखे पेट अनाथ बच्चे कैसा परिवार ? मैं बर्बाद तुम बर्बाद कौन आबाद ? मेरी लड़ाई तुम्हारी लड़ाई किसकी कमाई ? मेरा पैसा तुम्हारा पैसा किसके पास ? मेरी भूख तुम्हारी भूख मेरे दर्द तुम्हारे दर्द मैं चुप तुम खामोश खामोशी में हम हमारे सच हमारी ज़िंदगी हमारा परिवार हमारे बच्चे   हमारी दुनिया !

समंदर अहंकार!

साहिल डूब रहे हैं अपने ही समंदर से, और सर चढ़े समंदर को शऊर कहां? बिखर कर खो जाओगे समंदर, इल्म है? बूंद से सीखो ऐसी तुमको नज़र कहां? भूल कर शुरुवात, अंत को इतराते हैं? मील के पत्थर हो तुम, मुसाफिर कहां? पहाड़ों को जज़्ब करके अट्टहास क्यों? वही बन गए जिसको तुम गिराते हो? एक ही रंग में भिगो दिया सबको? मुरख! अपनी ही पहचान गंवाते हो? वो बाबरी थी ओ तुम भी बावरे निकले? कट्टरता कहते थे (जिसको) वही दिखाते हो

रंग बेरंग!!

जमीं नहीं रही अपनी, पैर टूट गए, रहसह के बस मेरे पंख छूट गए! उड़ने के सिवा अब चारा नहीं, इस तरह वो मेरे रास्ते लूट गए! खून से अपने ही महक आती है, नफ़रत को सब, अपने जुट गए! बस एक रंग में सब बातें करनी हैं, मेरे आंगन के सारे मौसम उठ गए! कौन कहता है कि दुनिया मेरी हो, लाइब्रेरी से वो शब्दकोश हट गए! मेरे तुम्हारे अब हमारे नहीं रहे, यूं रिश्तों में मायने सिमट गए! सब के सच अब अलग अलग हैं, ये बोल सब महफिल से उठ गए! 

टुकड़े टुकड़े भारत!

मैं टुकड़े टुकड़े हूं, मैं भारत हूं, किसी की आदत, कोई बगावत, किसी की शिकायत, किसी की नज़ाकत किसी को जमीन हूं, किसी की जानशीन, किसी को मोहब्बत हूं, किसी की हुज्जत हूं, दिन रात, देर-सबेर, मैं एक नहीं हूं, कभी था ही नहीं!

बैठे हैं, बस!

एक आह लिए बैठे हैं एक चाह लिए बैठे हैं, पहचाने रास्ते हैं फिर भी गुमराह हुए बैठे हैं! दर्द तमाम लिए बैठे हैं, क्या इतमिनान लिए बैठे हैं? अपने दिल के बगीचे को वीरान लिए बैठे हैं! एक मुस्कान लिए बैठे हैं, कैसा ये काम लिए बैठे हैं, कहीं कुछ आसान करेंगे, ये गुमान लिए बैठे हैं! अपना आराम लिए बैठे हैं, नक़ाब पहन लिए बैठे हैं, करम के फल हैं सारे,  मूरख मान लिए बैठे हैं! हाथ बांध लिए बैठे हैं, झूठी शान लिए बैठे हैं, कत्ल हो रहे है सच कितने, ओ वो राम लिए बैठे हैं? नया विज्ञान लिए बैठे हैं, चंद्र, मंगलयान लिए बैठे हैं, ऑक्सीजन कम हुई तो क्या? सब बंद कान लिए बैठे हैं!! नफ़रत ठान लिए बैठे हैं, कैसा धर्मज्ञान लिए बैठे हैं मंत्री संत्री सब एक सुर में, तोतों सा ज्ञान लिए बैठे हैं! मुंह में राम लिए बैठे हैं, बगल संविधान लिए बैठे हैं, घड़ियाली आँसू हैं सारे, ओ सब सच मान लिए बैठे हैं?

बेला चाओ, गो कोरोना गो!!

उम्र भर का आराम कैसे भुला दें? भरपेट बचपन ओ जवानी का सुकून कैसे गँवा दें? वो गद्दे, वो रजाई, मुँह ढक चददर, कूलर की हवाई, वो चारदिवारी, वो छत, वो क्यारी  वो अदब सरकारी, बाप जिला अधिकारी ऊपर की जात हमारी, धर्म राम सवारी, नास्तिक बीमारी, हमारा कौन बिगाड़े? सब चीज़ जुगाड़ है, 6 तरह कि दाल, चावल सफेद और लाल, सब्ज़ी, फल, घी, दूध तेल, वजन घटाने में अब भी फेल  मेहनत सुबह की दौड़ है,  आरामतलबी,  नैटफ्लिक्स, पैसा डकैती (मनी हाइस्त) में नए मोड़ हैं!! बेला चाओ चाओ चाओ सड़कों पर आओ, आवाज़ उठाओ, आओ साथ, आओ आओ , साथ आओ वो कौन हैं (बांद्रा टर्मिनस पर)  जो शोर करते हैं, काम नहीं, बस फल भरते हैं, आवाज़ बहुत है, तोड़ने की नहीं, अफ़सोस, ये टूटने की है! रिश्ते, उम्मीद से, हालात से इतना दबाया है हमने इन्हें ये बस जीते हैं, किसी तरह, टुटे हुए, और उन्हीं टुकड़ों को  बचाने में लगे हैं, हक़ कहाँ है कोई, सब घर जाने चले हैं! बेचारगी की जमीन में ख़ुद को दफ़नाने! आप हम सब जानते हैं, हमदिली भी है, मदद कोई यहां से चली भी है, दुःख, गुस्सा...

मैं प्रिविलेज!

  मैं धर्म और जात हूँ, सरकारी हालात हूँ, मेहनत का मज़ाक हूँ, मक्खन मलाई औकात हूँ! मुझे क्या फर्क पड़ेगा, तबरेज़ की रामहत्या से पायल के जातमत्या से मैं मिडिल क्लास हूँ!! मैं शहर हूँ, अपार्टमेंट घर हूँ, आरओ से तर हूँ, बस्ती से बेख़बर हूँ! स्लमबाई काम करती है, माफ़िया टैंकर पानी भरती है, मैं क्यों अपना हाथ लगाऊं, कचरा गीला सूखा बनाऊं? बस ट्रेन में ए.सी. हूँ, बाज़ार में निवेशी हूँ, मर्ज़ी जो परिवेशी हूँ, क्रेडिट कार्ड का ऐशी हूँ! मर्द मर्ज़ी मूत्र हूँ, पितृसत्ता पुर्त हूँ बाप, भाई, पति ताकत का सूत्र हूँ! जात में "नीच" नहीं, औकात में बीच हूँ, मर्द बीज हूँ त्योहार तीज हूँ! मैं हिंदी भाषी हूँ, मतलब खासमख़ासी हूँ, बहुमत की बदमाशी हूँ, जन्मसिद्ध देशवासी हूँ!

चाल चलन!

यूँ हालात है और नदारत सब सवाल है, कौन चल रहा है और किसकी चाल है? नज़र आता है और सबको मलाल है? "यही होता आया" किसकी मज़ाल है? सबको लगता है के उनका दिल साफ है! नज़र फेर ली है और अपना खून माफ़ है? ताकत सच है कमज़ोर का क्या हक़ है? पैदाइशी बराबरी ये भी एक कमाल है!! भक्ति धर्म है और चौतरफा कचरा कर्म है, चौखट पर सर है और कलयुग काल है? नफ़रत पल रही है ओ शिकारी शिकार हैं, गुस्सा सभी को है और ये भेड़चाल है!! देवघर एक धर्मस्थल श्रद्धालुओं के कचरे से लिप्त धर्मभक्ति, देशभक्ति आज दोनों बेलगाम हैं, गुंडों की टीम है और सियासत कप्तान है!! (देवघर, झारखंड में 10 दिन गुजारे, सवाल दिमाग में आये, वहां धार्मिक टूरिस्ट के फैलाए कचरे से, ये वही लोग हैं जो राम मंदिर चाहते हैं? वही लोग जो स्वच्छ भारत को तत्कालीन सरकार की उपलब्धि मानते हैं। वही लोग अपनी सोच और कर्म से भारत को प्रदूषित तो नहीं कर रहे?)