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क़ाबिल सनम

ख़ुद से इंकार तो नहीं है, फिर भी, ये कब कहा कि हमको हम चाहिए? कोई दावत नहीं है दुनिया के गम को, ओ ये भी नहीं कहते के कम चाहिए! इंसानियत तमाशा नहीं है बाज़ार का, क्यों गुजारिश के आंखे नम चाहिए? इरादे आसमान पहुंच जाते हैं, तय बात! मुग़ालता है के बाजुओं में दम चाहिए! भगवान के नाम पर तमाम काम हैं, इंसान को ज़िम्मेदारी ज़रा कम चाहिए! कोई अलग है तो वो उन्हें नामंज़ूर है, सरपरस्तों को मुल्क नहीं हरम चाहिए! ताक़त से अपनी सब सच कर डालेंगे, इंसाफ़ नहीं फ़क्त उसका भरम चाहिए! क़ुबूल है कहने वालों की कीमत बड़ी, उनको कहाँ क़ाबिल सनम चाहिए? तमाम हैं हम फ़िर भी अकेले हैं, कारवाँ होने को दूरी कम चाहिए! उम्मीद जिंदा भी है और होश भी, कोई कह दे बस के हम चाहिए!

ख़ामोशी से बातें!

ख़ामोशी बढ़ती है, तो ज़हर बन चढ़ती है, ज़हन ओ जिस्म पे अपना जामा जड़ती है! सुन तो लेते है लोग पर गुन नहीं पाते, बोल देते है बात जो हम सुन नहीं पाते! अपनी समझें कि, कही को माने, जानें किसको, किसको पहचानें! खुद से है कई बातें कह नहीं पाते, अपनी ख़ामोशी भी सह नहीं पाते! तमाम सच सबके एक अपनी हक़ीकत, इतने धारे हैं कि हम बह नहीं पाते! जिसे देखो पतवार लिये खड़ा है ड़र के मारे हम किनारे नहीं जाते! मिलते हैं सब कोई मक़ाम बनकर, काश कोई आये बस कान बनकर! हम से भी ज़रा रायशुमारी हो, जिक्र हो जब बात हमारी हो! पहले कुछ बात हो,  फ़िर बात को साथ हो,  फ़िर कहना के साथ, सफ़र को नहीं आते!

कुछ खोया . . . नहीं !

रुकी-रुकी सी सुबह ये रात कैसे गुजर गयी ये हवा का रुख है बदला या खुशबू तेरी ठहर गयी जो अभी-अभी थी जली हुई वो आग कैसे बुझ गयी तूने पलकों का परदा गिरा दिया या आँख मेरी खुल गयी वक्त-वक्त की बात है , तू हमेशा मेरे साथ है तु ख्वाब मेरे तोड़ दे तेरी याद मेरे पास है लम्हे-लम्हे का हिसाब क्या , एक उम्र पूरी गुजर गयी अकेली ही थी तू , जो तस्वीर पर नज़र गयी कभी-कभी ये ख्याल भी , रगें दिल की सिहर गयीं , बस जिक्र तेरे नाम का , कुछ बात ऐसे असर गयी जगी-जगी ये रात और सब करवटें ठहर गयीं खामोश मेरे हालात थे और बात सारे शहर गयी ,