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ज़ाहिर बात!

हमसे ही हमारी बात करते हैं, हम भी उनसे ये शिकायत करते हैं! हम नहीं जज़्बात ज़ाहिर करते, वो हमसे यही हिदायत करते हैं! नींद ही ऐसी के बिछड़ जाते हैं, और वो सपनों की बात करते हैं! काम, नाम, आराम सब साथ है, झग़डे, तो हम मशवरात करते हैं! लंबा सफर है, हो चला और बाकी हम कहां मंज़िल की बात करते हैं! अकेले भी दोनों अच्छे खासे हैं! साथ में तो हम कमालात करते हैं!! अरसा हुआ अब सारे एब ज़ाहिर, उम्मीद से रोज़ मुलाक़ात करते हैं! एक हैं पर एक जैसे नहीं, फ़र्क, हमें समझदार करते हैं

हकीकत की माया!

वो इंसान ही क्या जो इंसान न हो? वो भगवान ही क्या जिसका नाम लेते जुबां से लहुँ टपके? वो मज़हब ही क्या जो इंसानो के बीच फरक कर दे? वो इबादत कैसी जो किसी का रास्ता रोके? वो अक़ीदत क्या जो डर की जमीं से उपजी है? वो बंदगी क्या जो आँखे न खोल दे? वो शहादत क्या जो सिर्फ किसी का फरमान है? वो कुर्बानी क्या जो किसी के लिए की जाए? वो वकालत कैसी, जो ख़ुद ही फैसला कर ले? वो तक़रीर क्या जो तय रस्ते चले? वो तहरीर क्या जिससे आसमाँ न हिले? वो तालीम क्या जो इंक़लाब न सिखाये? वो उस्ताद क्या जो सवाली न बनाये? वो आज़ादी क्या जिसकी कोई जात हो? वो तहज़ीब क्या जिसमें लड़की श्राप हो? वो रौशनी क्या जो अंधेरो को घर न दे? वो हिम्मत क्या जो महज़ आप की राय है? वो ममता क्या जो मजहबी गाय है, बच्ची को ब्याहे है? वो मौका क्या जो कीमत वसूले? …… फिर भी सुना है, सब है, इंसान, भगवान्, मज़हब, इबादत, क्या मंशा और कब की आदत! अक़ीदत और बंदगी, तमाम मज़हबी गंदगी! शहादत ओ कुर्बानी, ज़ाती पसंद कहानी! वक़ालत, तहरीर, तक़रीर, झूठ के बाज़ार, खरीदोफरीद! तालीम और उस्ताद, आबाद बर्बाद! आज़ाद...

जेन कहावतें!

सेहत की नेमत मत मांगो, किसी ने पुराने समय में कहा, बीमारी कि परेशानी से, अच्छी दवा बनती है! बिन मुश्किल ज़िंदगी मत सोचो, आसान ज़िंदगी आलसी दिमाग और बिन सोचे धारणा बनवाती है, किसी ने पुराने समय में कहा, इस ज़िंदगी की बैचेनी और मुश्किलें गले लगा लो! तुम्हारी साधना में बाधाएं नहीं आयेंगी, हमेशा ये उम्मीद बेमानी है, रुकावट के बिना, सच की तलाश, ज़हन को थका देगी किसी ने पुराने समय में कहा, मुश्किलों में ही मोक्ष है! कठिन साधना में कुछ अनहोनी न हो, ये उम्मीद व्यर्थ है, अंजाने से बचना, कमज़ोर कोशश की निशानी है, किसी ने पुराने समय में कहा, कठिन साधना आसान बनाओ, सर सवार हर भूत को, दोस्ती का हाथ बढाओ! कुछ खत्म करने की ज़ळी न करो, आसानी से मिली चीज़, इरादों में सेंध लगाती है, किसी ने पुराने समय में कहा, जो कर रहे हो उसे पूरा करो, तमाम कोशिश करो! दोस्ती में फायदा मत सोचो, खुदगर्ज़ दोस्ती, यकीं को जख्मी करती है, किसी ने पुराने समय में कहा, "दिलसाफ दोस्ती दोस्ती को पोसती है" लोग तुम्हारी पीछे चलेंगे ये उम्मीद बेमानी है, लोग अनुयाई बन जाएँ तो आप घमं...