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मन के मौसम!

  मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, बादल ले कर आसमां आ रहे हैं, रंगों को कुदरत से छलका रहे हैं, ब्रशस्ट्रोक हवाओं के लहरा रहे हैं, कैनवास पल–पल बदल आ रहे हैं, ज़मीन पैरों तले पिघला रहे हैं, खड़े हैं जहां, वहीं बहे जा रहे हैं, मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, और वहीं हैं हम जहां जा रहे हैं! पहुंचे थे पहले पर अभी आ रहे हैं मूर्ख हैं जो वक्त से नापने जा रहे हैं, खर्च वही है सब जो कमा रहे हैं, दुनिया कहेगी के गंवा रहे हैं, और जागे हैं जब से जो मुस्करा रहे हैं!

अनगिनत सच!

आज ये हाल है, बादल पूछ रहे हैं, आपका क्या सवाल है? क्या काया है, क्या माया है? हर लम्हा सौ का सवाया है! किस को बनना बोलें, किस को बिगड़ना? अनगिनत सच, एक साथ,  कोई किसी से भिड़ता नहीं है, न कोई चिढ़ता है! सब जानते हैं,  खुद से कोई कुछ नहीं है, जमीं से आसमाँ बनता है, पहाड़ से बादल, पेड़ से हवा, कौन सौ, कौन सवा, कीजिए "मैं" को हवा, पल बनिए, लम्हा चलिए, मर्ज़ी उस रास्ते निकलिए, जो है बस अभी है, या मौका फिर कहाँ, कभी है! आज़ाद हो जाइए, आबाद हो जाइए! Swati साथ at The Chirping Orchard Honestly in Mukteshwar.

बादल बारिश मौसम

दिखती नहीं है बारिश पर छू जाती है, चलो वहां रुकें .. सही में कहीं दूर से,  जैसे अनजाने सुरूर से, आया कितने गुरुर से, बादल वहीं पे, सबको  सरोबर करके  हसीं कारोबार करके उदास होते, लम्हों को प्यार करके बारिश  है कहीं, हाथ में डोर लिए,  अपना सच छाप के, अपना रास्ता नापते, मौसम झट से , कल को छोड़ के,  होकर नये मोड़ पे, सब के सच बदलती जमीँ 

आसमान, बादल और हम

यूँ जल गए आसमान हंसते हंसते, तेवर सारे रुख बदल आसान हो गए! इरादे नज़र आएं आसमान में कई, सिर्फ आसार हैं जो दिल से बयाँ हैं बूँद बूँद ही सही भिगा कर मान गए रास्ते मुसाफिर से पहचान बनाते हैं ! हकीकतें रंगीन और सच काले झूठे, मुसाफिर कुछ सामने कुछ पीछे छूटे.. सच्चाइयाँ समेट कर मुट्ठी भर आसमान, अर्ज़ करता है आप भी सुन लीजे! सपने बिखेर के मुट्ठी भर, आसमान, अर्ज़ करता है आप भी चुन लीजे! बादलों की नकाब से रंग निकले हैं, यूँ आज हर तरफ मज़ाज बदले हैं!.... बादल हैं समय के साथ बदल जाएंगे, पैगाम नज़र में है कब असर में आएंगे? 

आसमान पढ़ लीजे!

चमकते चौंधियाते सच चंद लम्हों के, रंग बदलते हैं तो क्या झूठे हुए? आहिस्ते से सौम्य हो गए आसमान, रुके क्यों हो आप चले जाओ, बदल आओ की हम सच बदलते हैं, अपने रंग पहचानो तो सच हो जाये! शरारत भी इसी में और शराफत भी, ये समझ जाओ तो सच सच हो जाए! कल मत इंतज़ार करना सच होने का, कल यही होगा तो वो सच नहीं होगा! आसमान आपके भी यूँ ही रंगीं हैं, बैचैनी सी कैफियत छोड़े तो ज़ाहिर हो! मुट्ठी भर जो हाथ आई बयाँ हो गयी, कम नहीं थीं सच्चाईयां चंद इज़ा हो गयीं!

बादल अनलिमटेड़!

बादल , पागल , चले ज़मीन आसमान एक करने खाई का फ़रक लगे भरने , बेअक्ल या बेलगाम , सुरज की रोशनी को मुँह चिढाते , इतराते , इठलाते , भरमाते , नरमाते , पल - पल उम्मीदों को अजमाते , खड़े रहो कंचनजंघा अहम के साथ इस भरम में कि उंचाई विजय है , और बस एक छोटा सा टुकड़ा , जिसे न अहम है न वहम खोते - खोते होता हुआ , या फ़िर होते - होते खोता हुआ , आपकी झूठी सच्चाईयों को गह लेता है , दो पल के लिये ही सही , मोक्ष - एक पल का ही एहसास है , क्या आपके पास खालिस विश्वास है ?

युँ हो कि !

उड़ो उस सपने की तरह          जो इस धरातल पर पला है बहो उस खुशबू की तरह         जो कुछ मांगती नहीं चलो उस लहर की तरह,         जो जीती है, हर पल के लिये         अंत की तस्वीर आखॊं में लिये  गिरो उस बीज़ की तरह         जो बादल के बरसने और         सुरज के चमकने का कारण बनता है रुको तो ऎसे कि किसी के          चलने का कारण बनो मुस्कराओ, मदमाओ          आंधी में झुमते तरुवर की तरह बहक जाओ भी तो          पैरॊं में अपनी जमीं को लिये पहचान हो अपनी ऐसी कि          कहीं भी खो जाओ बन के नदी सागर को भिगो जाओ!

नीलिमा

दो अंतहीन बादल और उनके बीच नीले आसमान का कतरा इतनी नीलिमा इतनी स्वछंद कोमल और पिघलती कुछ ही लम्हों में घुल जायेगी जैसे कभी थी ही नहीं! वो नीलिमा फ़िर कभी नज़र नहीं आयेगी क्या तुमने उससे रिश्ता नहीं जोड़ा . . .? (जिद्दू क्रष्नमूर्ती की चहलकदमी और उस दौरान आये विचारॊं का काव्यअनुवाद )

खुदगर्ज़ मन की दुआ!

गर्मी में बारिश की झलक,  नेक इरादॊं के फलक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक,  कुछ देर तलक और चंद  लम्हों तलक, झपक न जाये पलक बिरली सच्चाई है देर उतरेगी हलक  खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक   सुन के बादल कि गरज, जाग उठती है ललक  कौन जाने असर दुआ का है,  या मर्ज़ी ए मलक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक  हम अकेले नहीं, कहती है पंछी की चहक सर हलाती हैं जमीं,  भेज मट्टी कि महक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक  कान में बारिश की टिपक, पत्तों पे बुंदों की चमक, हर सांस इशारे से, कहती है ज़रा और बहक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक