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संदेश

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रिफ़्यूज़ी!

समंदर और साथ सफ़र, लहर साहिल मुक़म्मल, अधूरे किनारे, हर लम्हा बदलते, रुके हैं पर खत्म होने को... लहरें बहती हुई, पर कहाँ जाने को? और साथ, मुसाफ़िर, बिछड़े, भटके, अधर में अटके, न छत सर है, न लम्हे असर हैं, रास्तों को खुद नहीं पता, वो कहाँ जाएंगे, कैसे कहें उनको के ज़िन्दगी सफर है, बेबसी रहगुज़र है?

महाज़िर!

बस मौजूद हैं, इतना ही वुजूद है, उनका, उनकी छिन गयी सरहदें सारी, बस एक पहचान, महाज़िर इंसानियत तमाम मौज़ूद, फिर भी सिर्फ महाज़िर, हर क़तार में आख़ीर आख़िर क्यों? और अब तमाम हरकतें, दुनिया का ज़मीर, और एक केंप, क्योंकि वो इंसान हैं, आख़िरकार! क्या है पहचान? वो जो बनाती है? आपको, एक मज़हब, एक जात, एक इलाक़ा, एक सोच, और फिर एक से दो, और फिर दो-दो हाथ! कोई बेहतर, कोई बरबाद! पहचान जब हो, क्या इंसान फिर भी है? आप कौन है? मददग़ार? या अपने ज़मीर के गुनहगार आप भी मौजूद हैं!

क्या समझें!

नाइंसाफ़ी है,   दुनिया में काफ़ी है,  बिखरते सपने,  टूटते इरादे, और,  खुद से ही वादे,  कुछ आँसू,  कुछ मुस्कानें,  थॊड़ी मायूसी,  फ़िर भी ज़ीना कम नहीं करते,  हर दिन एक ज़ंग है,  और वो जीत रहे हैं,  खाली हाथ! (आभा का एथेंस, ग्रिस से संदेश जहाँ वो रिफ़्युज़ी केंप मे काम कर रही थीं, - ........so many stories of struggle and individual trimuphs, smiling faces of young people.... some frustrated.....some crying...but stull winning at the everyday game of life in some way....so f'ing unfair... क्या समझें? कोई घर है,  और कितने बेघर,  बेदर,  कोई मुसाफ़िर,  समंदर किनारे,  तंबू घर में रात गुजारे,  और कई मेज़बान,  दिल खोल,  कहते हैं,  "मी कासा इज़ तू कासा"* क्या नहीं है ये इंसनियत कि भाषा? हम सीख  रहे हैं या भूल रहे हैं? बोल रहे हैं कितने पर,  कितने दरवाज़े खोल रहे हैं? (...so many people have to go through this....can't make sense of this. There are some people ...

एक बूँद समंदर!

समंदर एक नज़रिया है,  बूँद एक ज़रिया,  बूँद ही इरादा है,  कोशिश है,  बेचैनी,  तलाश, काश! समंदर को फ़र्क पड़ा है! क्या देखिए? आखिर वो एक बूँद है! और एक, और एक,  'सिर्फ़ एक' नहीं, "पूरी एक" बूँद का सफ़र ही है,  समंदर का असर,  मकाम कुछ नहीं, बस! रह गयी कुछ कसर,  रोका किसने? करते रहिए सफ़र! बूँद ही समंदर है,  बाहर नहीं आपके अंदर है,  सोगवार क्यों? बेकरार रहिए! और थोड़ा,  बेसब्र,  ऐसे ही बूँद, दरिया,  और दरिया समंदर होता है! (आभा जेउरकर और अज़ात शत्रु पिछले ३ हफ़्तों से एथेंस, ग्रीस में रिफ़्यूज़ी युवाओं के साथ काम कर रहे है, अब लौटने का वक्त आया है और आज सुबह सुबह आभा का ये संदेश मिला, बस लफ़्ज़ सफ़र पर निकल पड़े, Abha - ".... at least I felt like I could do my best, knowing fully well that it is just a drop in the ocean. ")