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गुनााह कबूल

अपने ही इरादों की हम भूल हैं, जो गुनाह कहिए हमें कबूल हैं! खून उबलता ही नहीं है, चाहे जो, जज़्बात हमारे बड़े नामाकूल हैं! दम तोड़ रहे हैं तमाम सच हरदिन, और हम बस बातों के फिजूल हैं! दर्द सारे के सारे बेअसर हो चले हैं, और कहने को हम बड़े "कूल" हैं! आम कत्ल हैं और ख़ास जेल में, आज़ाद हमारे मध्यमवर्गी उसूल हैं! फर्क पड़ता, भवें तनती ओ सांस तेज, फिर हम पूरे निक्कमेपन के वसूल हैं! आबोहवा में जहर घोलती है दुनिया, और हम 'एक' बदलने में मशगूल हैं!

पूजा अर्चना प्रार्थना!

अपने से लड़ाई में हारना नामुमकिन है, बस एक शर्त की साथ अपना देना होगा! और ये आसान काम नहीं है,  जो हिसाब दिख रहा है  वो दुनिया की वही(खाता) है! ऐसा नहीं करते  वैसा नहीं करते लड़की हो, अकेली हो, पर होना नहीं चाहिए, बेटी बनो, बहन, बीबी और मां, इसके अलावा और कुछ कहां? रिश्ते बनाने, मनाने, संभालने और झेलने,  यही तो आदर्श है, मर्दानगी का यही फलसफा,  यही विमर्श है! अपनी सोचना खुदगर्जी है, सावधान! पूछो सवाल इस सोच का कौन दर्जी है? आज़ाद वो  जिसकी सोच मर्ज़ी है!. और कोई लड़की  अपनी मर्जी हो  ये तो खतरा है, ऐसी आजादी पर पहरा चौतरफा है, बिच, चुड़ैल, डायन, त्रिया,  कलंकिनी, कुलक्षिणी,  और अगर शरीफ़ है तो "सिर्फ अपना सोचती है" ये दुनिया है! जिसमें लड़की अपनी जगह खोजती है! होशियार! अपने से जो लड़ाई है, वो इस दुनिया की बनाई है, वो सोच, वो आदत,  एहसास–ए–कमतरी, शक सारे,  गलत–सही में क्यों सारी नपाई है? सारी गुनाहगिरी, इस दुनिया की बनाई, बताई है! मत लड़िए, बस हर दिन, हर लम्हा अपना साथ दीजिए. (पितृसता, ग्लोबलाइजेशन और तंग सोच की दुनिया में अपनी ...

सच आसपास!

हालात, बिगड़े हुए, और  बिगड़ेंगे, टूटे हैं जो, और बिखरेंगे, कमज़ोर चूस कर ताकत बढ़ाते हैं, आपने किस को वोट दिया? था? संस्कृति पुरानी है, गौरवशाली, कड़वे सच रौंद कर, मन की बात, इतिहास, बन रही है, अंधभक्तों की  नई जमात, गर्व से कहो... "जिसकी लाठी उनकी भैंस" बुरा लगता है देश अपना समाज अपना धर्म, जात वर्ग, अपना, अपने द्वारा, अपने लिए, बाकी सब ? पतली गली से निकलिए, गांव, झोपड़-पट्टी, कचरे पर, कचरा जोड़, बेच, पैबंद लगी दीवारों की बस्ती! मेरा भारत महान, मेरा सामान, मेरी दुकान मालिक, सरपरस्त, सेठ, नेता, प्रधान, सर्वेसर्वा कितने नाम, ऊंची दुकान  फीके पकवान, मुसीबत में सब उड़नछू हराम!  हेराम! आपका वोट आपका अंजाम! सच जानेंगे या मनकही मानेंगे? अनकही बातें,  अदृश्य, अनगिने लोगों की, अनचाहे लम्हों की, अनगिनत मुश्किलें, उबलते सवाल, क्या आपको नहीं हैं? जो होता है क्या वो सही है? आपके सवाल कहाँ हैं?

अफ़सोस, ए मुल्क!

नील सलाम!

अफ़सोस तो बहुत है पर क्या होगा, मेरे होने को कोई तो वज़ा होगा? चराग़ नहीं बुझा रौशनी चली गयी, एक दरख़्त के नीचे जमीं चली गयी! वो क्या वज़न है जो पैरों को ज़मी करता है, कुछ खो गया आज बड़ी कमी करता है! आज उम्मीद बहुत उदास हो गयी, अज़नबी सी अपनी ही साँस हो गयी! किसी कोने में ज़िन्दगी के कितना वीराना है, खुद को भी तमाम कोशिश कर मिल न पाये! ....दिल रो दिया...कुछ मैंने भी खो दिया....! काला सच है हम सब ने रोहित को मारा, चला गया वो हम सब को कर के बेचारा!   एक दबी हुई चीख हम क्या समझेंगे, किसी ने हम को सांस लेने से कहाँ रोका! उम्मीदें आसमान होती हैं इंसान की, पर मर्ज़ी चल रही जात के पहलवान की!!

रोहित वेमुला - एक सोच

  मैं भी पूरा इंसान हूँ, आप भी? अगर होंगे तो समझ पाएंगे! बस गिनीतियों में सीमित है पहचान, ये क्या दौर है, ये क्या इंसान?? उम्मीदें खोयी है इरादे अब भी यहाँ हैं, सितारों के आगे और भी कोई ज़हाँ हैं!   ये कैसी अवस्था है, बड़ी बीमार व्यवस्था है! चुपचाप सर झुका रहिये तो आप इंसान हैं, सवाल उठाने वाले दो दिन के मेहमान हैं! ये कैसी मोहब्बत कि पंख नहीं देती, सितारों के आगे जहाँ और भी हैं  क्या आपकी कोई जाति है, या आपको मानवता आती है!? कितनी बीमार सोच है, की कोई पैदाइशी कम है!   एक ख़त, और कड़वे सच, बेबाक कितना, कितना बेबस! कड़वी लगी है तो सच जरूर होगी, उम्मीद है ज़हन में दर्ज़ ज़रूर होगी! (रोहित का खत एक ऐतिहासिक दस्तावेज है, ये पड़ कर महसूस किया था, पर अब ये सच बन कर दुनिया के अलग अलग कोनों से विरोध प्रदर्शन की तस्वीर बन कर आ रहा है। उस खत और उस में जिन सच्चाइयों कि तरफ़ इशारा किया है उन्हीं से निकल कर ये अभिव्यक्ति बाहर आइ है।)

सचपन!

सचपन! 8-10 साल की उमर , और मज़बूत कमर ,  एक और को संभालने को , खेलने की उमर है , बचपन नाम है , चंचलता पहचान है , हरकतें है वैसी ही , और बड़ी जान है , तैयार फ़िर भी , हमेशा , अपनी नज़र और  अपनी कमर से , कब रो दे ,  माँ रोटी करती है , भूख लगी है ,  माँ पानी भरती है , गिर गया ,  माँ मज़दूरी पे है , आप ही बताईये ,  क्या कहें ? बचपन है? पर ये कह कर दूर खड़े होना , बचकाना होगा , बदनाम , बचपना होगा , इसलिये कमर कसते हैं , हंसते हैं , यही हमारा सच है , गुम कहीं बचपन है , जो है बस यही सचपन है !! (सरकारी आँकड़े कहते हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं, और सच, छह मुसहर बस्तियों में से लगभग सभी बच्चे स्कूल नहीं जाते!)