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हम लोग!

  रीढ़ की हड्डी पहले ही नम थी, अब ऑक्सीजन भी कम है! जो बोया वही काटते हैं, आख़िर किस बात का गम है? सच का सामना हुआ अब, तो मन की बात झूठ लगती है? अब पछतावत होत का, नफ़रत ऐसे ही फलती फूलती है! जो नज़र ही न आए, वो सच है के झूठ? भक्ति का काम है जपें "बहुत खूब, बहुत खूब"! मरने वाले सब लाश हो गए, ज़िंदा हैं जो काश हो गए, ध्यान से सुनिए खबर, सच सब सत्यानाश हो गए! अच्छों अच्छों के पाप धुले हैं,  डुबकी लो बस आप भले हैं! उनके गुनाह नहीं गिनते मूरख,  जो गाय दूध-मूत धुले हैं! कुम्भ_करन को सब जाएं,  करमकांड को करम बनायें, भक्ति मोह-माया बन गई,  एक दुजे से होड़ लगाएं!   

शुभ या सिर्फ़ कामनायें?

अष्टमी, चतुर्थी, नवमी और सफाई की तेरवीं, हमारी कृति है या हमारी महान संस्कृति? कल सब को गणेश की मूर्ति खरीदते देखा, समझ नहीं आया की लोग क्या बेच रहे थे? लगे हैं बड़े बड़े पंडाल से ललचाने, सब को भगवान अपने ख़ास चाहिए!  क्या मूर्ति खरीदना भक्ति बेचना नहीं है, भगवान के नाम सब अंधे काम करते हैं! शीला की जवानी गणपति उत्सव की जुबानी, किसी माथे पर शिकन नहीं, भक्ति की निशानी!! जबरन चंदा ले कर सब इंतज़ाम करते हैं, बड़ी मेहनत से मिट्टी को भगवान करते हैं! छैनी हथौड़ा हाथ से भगवान बनाया किसको खबर मज़दूर दो रोटी खाया! शोर शराबा चारों ओर कि भगवान चाहिए, हर गली हर मोड़ एक दूकान चाहिए साल भर चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, नवमीं, एकादशी, पर उनसे उपजे कचरे की तेरवीं कभी क्यों नहीं? धूम-धड़ाका, शोर-शराबा, बड़ा त्योहार, गली गली कचरे का बड़ा ढ़ेर तैयार!