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अपनापन!

हम  उन्हीं आवाज़ों से बात करते हैं , जिन्हें हम खुद सुन सकते हैं , और काया बोलती है , और वो बात करती है , सिर्फ़ , उस देह - ए - दुनिया से , जो उसकी पकड़ में है। और वो अपने आप में एक जहां हो जाती है , गौर करके , कि उसका सरोकार क्या है और ये सीखती है , कि उसे क्या होना है , और क्या लाज़मी है! (डेविड व्हाईट की द  विंटर ऑफ़ लिसनिंग से) From  The Winter of Listening by David Whyte in  The House of Belonging

कायकू?

चलता है वही, जो चलता है, किसका क्या जाता है? बादल सच हुए, बरस बरस के, तरसे तर हो गए! सिसकते पहाड़, मिट्टी पत्थर सरकते, आएं किसके रास्ते? कितना ऊपर पहुंचे, तरक्की तमाम, नीचे गिरें धड़ाम! सभ्यता में जानवर, पालतू, आवारा, जंगल,जंगली नागवारा!! हाइवे लंबे लंबे, दूरियाँ कम करते, गांव के बीच से! रोडोडोन्द्रों (बुरांश) फूल, पैसा वसूल, जो जैसा जहां है! छुप रहे हैं सब? बादल, आसमाँ, पेड़! नज़र या नज़रिया? ठंडा गरम सूरज नरम तुम हम! लंबी चढ़ाई, घुटनों से लड़ाई, खुद पीठ थपथपाई!