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जलदी ही!

जलदी ही! अकेले लेटे हुए खाली हाथ, अकेले सरहाने, तुम्हारा ख्याल, संगी, रात, आसामाँ भक्क खुली आँखें अंधेरों को खिसकते हुए देखतीं, तुम नहीं हो रोज़ाना, ढूंढता हूँ, 'आनंद'  सांसारिक और सात्विक  समझा, साथ ....साथी  तुम आनंदित हो, (बगैर मेरे) मेरी दुर्दशा है, पिघलो मत, ये आह (तुम तक पहुंचेगी, कहाँ?) लाईट ऑफ़, दरवाज़ा अड़काया है, कदमों का आसार है, मेरी बाँहों को इंतज़ार है! (आनंद द्वारा रचित मूलरचना "Soon" को हिंदी में व्यक्त करने की कोशिश )

फ़रेब दिल के!

आईने झूठे हैं या हम मुस्कराते हैं , दिल को कैसे कैसे फ़रेब आते हैं , युँ ही याद कर लेते हैं आपको , यूँ ही आपके करीब आते हैं , मुश्किल नहीं होती आपके जाने की , हम नहीं रोज़ नसीब आज़माते हैं , खामोश आहटें साथ चलती हैं , नहीं दुरियों का शोक मनाते हैं आपकी मोहब्बत के गरीब नहीं ,  फ़कीरी के वो अंदाज़ आते हैं ! न हों तो हर लम्हा बदल जाता है कहां हमको ज़ुदा हिसाब आते हैं ऐसे कोई अकेले कम नहीं पड़ते , पास आये तो दुरियाँ गिनाते हैं बिस्तर को अकेले कम नहीं पड़ते दो हों तो क्यों फ़ासंले गिनाते हैं ? दिल को कैसे कैसे फ़रेब आते है , सपनों में भी हमको आज़माते है