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ये कैसे रिश्ते?

रि श्ते 'जरूर' होते हैं,  क्यों पर मजबूर होते हैं?  जितने नज़दीक हों,क्यों,  उतने मगरूर होते हैं?  रिश्ता मतलब साथ है  इज़्ज़त है, विश्वास है  फ़िर क्या इतना उकसाता है?  क्यों कोई हाथ उठाता है?  अब क्या रिश्ता रह जाता है? क्या सिखा रहे हैं रिश्ते,  समाज धर्म, व्यवस्था  "गर्व करो" जो जैसा जहां  सवाल की जगह,  कहां?  बड़ो की मानो  वो भी नतमस्तक होके परंपरा जानो, मानो  सीता पर शक  द्रौपदी पर बाज़ी,  काट दो नाक कान  अगर नहीं राज़ी  लगा दो इल्ज़ाम  "शूप्रणखा" वो कौन सी दुनिया होगी,  सब की जिसमें जगह होगी?  साथ ही साथी की वज़ह होगी  मोहब्बत इज़्जत से नापी जाएगी  ताकत सरताज़ नहीं होगी,  खुद को बनाने के लिए  दुसरे को तोड़ना नहीं होगा,  दुनिया के नाप से कोई  कम न होगा,  आज़ादी और क्या है?

प्यार कोरोना - Love in the time of Corona

प्यार में एक दूजे के मजबुर कर दिया हम ने खुद ही खुद को दूर (3 फीट) कर दिया साँसों से सांस मिली तो बात बढ़ जाएगी, इसलिए मास्क पहनने पर मजबूर कर दिया! पहले चिढ़ कहते, क्यों हाथ धो पीछे पड़े हो, अब हाथ धोते देख कर गज़ब मुस्कराते हैं!! यूँ तो साथ जीने मरने की कसम खाई है, दूर हो गए जबसे उनको खांसी आई है! धड़कने बढ़ जाती हैं बस देख के उनको, पर आजकल ये देख कर वो सहम जाते हैं! जो भी नज़दीकी थी अब दिल में रह गई, कहते हैं अब तो हम और पास आ गए?   ज़ुल्फ़ों तले गुजरेगी शाम ये वादा था पक्का, छंटवाते थे जो जुल्फें आज कटवा कर आ गए!! पहले अदा से इतरा के हाथ में ख़त थमाते थे, अब वो देख कर दूर से ही ताली बजाते हैं! तन्हाई में तस्वीर से मेरी बोलते होंगे, सोचा, ख़बर आई है कि मेरी कोविड रिपोर्ट ढूंढते हैं!!

हम तुम

गुम हैं, कभी खुद में, कभी तुम में, कभी हम में, हम हैं, कभी साथ, कभी अकेले, कभी साथ अकेले, तुम हो, कभी साथ, कभी अकेले, कभी तुम, प्यार है,         इश्क भी,           और मोहब्बत इक़रार भी,    कभी अश्क़,        कभी बंदगी तक़रार भी,    कभी रश्क़।        कभी बगावत सरसवार भी,  कभी फ़रहत       दिलअज़ीज़ आदत                            (bliss) गम हैं, ख़ुशी भी, शिकायत भी, शरारत भी ज़ख्म हैं, दवा है, दर्द भी, और दुआ भी नज़दीकी, कभी रूमानी, कभी रूहानी, कभी बेमानी हामी, कभी इनकार, कभी तक़रार, कभी इसरार मानी, कभी मनमानी, कभी बेमानी, कभी नानी😊 दूरी, कभी खुद से, कभी तुमसे, कभी अनबन से रास्ते कभी अपने कभी सपने कभी चखने मोड़, कभी बहकाते कभी बहलाते कभी संभलाते दोनों की अलग फ़ितरत, हर आदत, साथ क़यामत दोनों की एक सोच, साथ की दुनिया हालात की तमाम ताल्लुक़ात की ...

कैसे कहें कि इश्क़ है!

शौक इश्क है, कद्र इश्क है, समझ सके किसी का, वो दर्द इश्क़ है! इश्क़ नज़र है, मिलना, झुकना, फेर लेना, तरेर लेना, चुराना, नचाना कभी बचना, कभी बचाना इश्क इलाज़ है, मर्ज़ नहीं, रवैया है दिल का, फ़र्ज़ नहीं,  बचपन है, बचपना नहीं, सोच में पड़ गये, फ़िर इश्क़ क्या? इश्क़ सफ़र है, रुकने का नाम नहीं, क्यों आप किसी जिद्द पर अड़े हैं? 'हम ऐसे ही' तारीख़ हो गयी बात है, हाथ में हाथ है अब बदले हालात हैं! इश्क़ एकतरफ़ा ही होता है, इसमें इतफ़ाक तमाम होता है! जरुरत होती है किसी को, कहीं फ़क़त ज़ज़्बात होता है! इश्क़ ज़ज्बात है, हरदम किसी का साथ नहीं, अपने से भी कीजे थोडा, यूँ बुरे हालात नहीं!! इश्क़ नज़र है, हरदम नज़र मिलने की बात नहीं, अपने गरेबाँ झांकिए ये आइनों की बात नहीं!! वो लम्हा जब आसमाँ के नज़दीक खड़े, बादलों से बतियाना इश्क़ नहीं तो क्या? और अचानक नज़र आये फूल को उठा, सूंघ कर मुस्कराना इश्क़ नहीं तो क्या! रास्तों में एक मोड़ है इश्क, मुसाफिरी आशिक़ी का नाम है! क्या फर्क पड़ता है हमसफ़र, कौन, और कितनी दूर कोई मक़ाम है?

तू हसीं मैं यकीं!

तू हसीं हैं मैं यकीं हूँ, तू ज़मीं है मैं ज़मीं हूँ, ज़रा सा तू, ज़रा सा मैं, इस फलक की ज़र कमी हैं, हमकदम भी, हमनशीं भी, रास्तों के नशेमन लिए, हमनज़र भी, हमसफ़र भी तू असर है, मैं कसर हूँ,  तू खबर ओ मैं ख़ामोशी, मेरे शोर की तू सरगोशी, तू मय भी ओ मयखाना, मैं साकी ओ मैं पैमाना, नाप रहे है अरसों से, एक दूजे को हम रोज़ाना,  पुरे नहीं पड़ते कभी भी, खर्च हुए पर बिन हर्जाना, ज़िक्र आया तो कह देते है, लाखों अफ़साने क्या क्या फ़रमाना, मिल जाएँ गर किसी मोड़ तो, मत कहना की न पहचना!

हमसफ़री के 18-19

  फांसले अब भी आसाँ हैं नज़दीकी अब भी मेहमान इश्क के मुसाफ़िर हम हमसफ़र, आज हम जवान हैं फांसले दूर नहीं करते नज़दीकी मज़बूर नही करती इश्क के मुसाफिर हमसफ़र अपनी एक जुबां है करवटें अब भी नादाँ हैं इश्क अब भी शरीर एक काहिल और एक काबिल बात बाक़ी है इश्क जायज़ है रिश्ता नाजायज़ तमाम वज़ह ज़ारी आज़माइश रास्ते एक हैं फ़ितरतें अलहदा इश्क के मुसाफिर हम हमसफ़र अपनी एक अदा है हमसफ़री के १८-१९  जवाँ हुए हैं इन दिनों, हमतलबी के शिकार,  अपने मर्ज़ों की हमदवा हैं! साथ-सफ़र का सामान क्या वादों की जरूरत क्या तज़ुर्बे सब रस्ते मिलेंगे और सस्ते, मुश्किलें इरादे अब भी नादाँ हैं, इरादे अब भी आसाँ हैं, इरादे अब भी झांसाँ हैं, इश्क के मुसाफ़िर, इरादे अब भी सामाँ हैं!

कुछ खोया . . . नहीं !

रुकी-रुकी सी सुबह ये रात कैसे गुजर गयी ये हवा का रुख है बदला या खुशबू तेरी ठहर गयी जो अभी-अभी थी जली हुई वो आग कैसे बुझ गयी तूने पलकों का परदा गिरा दिया या आँख मेरी खुल गयी वक्त-वक्त की बात है , तू हमेशा मेरे साथ है तु ख्वाब मेरे तोड़ दे तेरी याद मेरे पास है लम्हे-लम्हे का हिसाब क्या , एक उम्र पूरी गुजर गयी अकेली ही थी तू , जो तस्वीर पर नज़र गयी कभी-कभी ये ख्याल भी , रगें दिल की सिहर गयीं , बस जिक्र तेरे नाम का , कुछ बात ऐसे असर गयी जगी-जगी ये रात और सब करवटें ठहर गयीं खामोश मेरे हालात थे और बात सारे शहर गयी ,  

नज़दीकियाँ!

नज़दीकियाँ आज़ कल थोड़ी दुर हैं रहती , कुछ आदतें जो इन दिनॊं मज़बूर हैं रहती , अधुरे एहसासॊं के लम्हे इकट्ठे होते हैं बैचेनियाँ ये कुछ रोज़ मसरूफ़ हैं रहती , उनके पास जाने के तमाम रस्ते हैं , ख्वाबॊं में पर कहाँ असल बात है रहती सीधी बात होती नहीं सो कहे देते हैं , कह दिये फ़िर सीधी बात नहीं रहती फ़ांसले नापने से युँ कम नहीं होते , युँ ही अपनी आँखे नम नहीं रहतीं!  

उंसीयत

बांध लो तो मैं हुं , छोड़ दो तो मेरी उंचाईंयां , किसने समझी जहां में उंसीयत की गहराईयां। रोक लो तो मंजिल , साथ दो तो रास्ता , जिंदगी के सफ़र की हैं बड़ी दुश्वारियां , चल रहे तो सफ़र है, रुके गये मकाम कोई, हाथ में बस हाथ है, क्यों और सामान कोई? धुप जलने को नहीं , न छांव बुझने को , पनपने देती नहीं हमें रिश्तॊं की परछाईंयां। आज़ तुम खफ़ा हो कल हमारी बारी है , आसां नहीं समझना रिश्तॊं की बारीकियां। मेरी खता नहीं , कहते हैं वो , मेरी भी नहीं , ले डूबेगी उंसीयत को अंह की बीमारियां। जमीं - जमीं रहे और हो आसमां बुलंद। उंसीयत एसी जो करे दो जहां बुलंद।। ठहर जाये किसी वज़ह किसी मोड़ पर ये रिश्तॊं की पहचान नहीं। न उड़े पंछी तो आसमान नहीं , बिन उंसीयत के बागवां नहीं।।  इससे अच्छी क्या बात हो,  अपना साथ ही हालात हो!

मासूम चीख!

मासूम चीख अंजान हालात अनगिनत सवालात पर शब्द कहाँ है? प्यार और, नाज़ुक ज़बरदस्ती माँ भी तो करती है, पर ये कुछ अलग एहसास है, और ये मुस्कराहट...! जहरीली पर शब्द कहाँ है? माँ को बोला, हंस दीं, “तू बहुत प्यारी है” सबको तुझसे प्यार है, पर मुझे मालूम है ये ‘स्पर्श’ बेकार है वो हाथ उन जगहों पर क्यों जाते हैं? “मासूम चीख” पर शब्द कहाँ हैं? आप समझ पाएंगे ? गोद है उनकी, चीजें मेरे पसंद की, सबको दिखता है “ये प्यार”, और मैं समझ नहीं पाती? वो कुछ दबाव, कपड़ों के साथ खेल, मम्मी भी करती हैं, पर ये कुछ अलग है, पर मेरे पास शब्द कहाँ हैं? खो गयी फिर मेरी... मासूम चीख! (लैंगिक शोषण के शिकार अनगिनत बच्चों को समर्पित, जिनकी मासूम चीखें माँ-बाप के कानों पर दस्तक देते देते थक जाती हैं)

सफ़र-ए-ताल्लुक!

किस मोड़ पर हमसफ़र होंगे,  मैं पहुँचती/ता हूँ,  उम्मीद है आप खड़े होंगे? कितना मुश्किल है बनते हुए रिश्तों की लकीरों पर चलना एहसास को क्यों शरीर चाहिए, क्यों लम्हों के अमीर चाहिए नज़दीक आने कि तमाम मुश्किलें हैं, मोहब्बत को फकीर होना चाहिए समस्या बहने कि नहीं बहते हुए रहने कि, चलो हम बह भी गए तो साहिल क्या होगा गुजरते वक़्त को कायल क्या होगा और रुक गये तो हासिल क्या होगा "इश्क" है जाहिल तेरा क्या होगा दूरियों के सब फर्क मिटा दें तो क्या हाथ आएगा  हांसिल होगा कुछ या होंसला बढ़ जायेगा नजदीक आयेंगे या फ़ासला आ जायेगा एक होँगे या आसरा बढ़ जायेगा पहचान आप से और अपने आप से मेरे हिस्से कि जमीं, और आप कि नजदीकियां मुझे अपने फासले पसंद हैं. नज़दीक होँ  तो आपको नज़र आयें, एक रास्ते भी हैं और सफ़र भी अलग नहीं पर मोड़ आने से पहले कैसे मुड़ जाऊं. जाहिर है मुड़ने का डर नहीं, जरा मुड़ कर भी देखिये मेरे पहुँचने में जरा वक़्त है. इंतज़ार सफ़र को रोकता नहीं शायद, मुश्किल है, पर इंतज...