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अधूरी बातें!

किस्से बहुत हैं तेरे मेरे अफसानों के, ग़नीमत है के बात अब भी अधूरी है? कहानी पूरी भी नहीं है न अधूरी है, समझ लीजिए कैसी ये मजबूरी है? कोई पूछे ऐसी भी क्या मजबूरी है? ख्वाइशें एक-दूजे से अभी अधूरी हैं! सुबह मेरी है अक्सर रात उनकी है, मर्ज़ीओं को जगह अपनी पूरी है? यूँ तो मान जाएं हर बात उनकी, पर वो कहेंगे ये क्या जीहजूरी है? साथ भी हैं उनके और उनसे दूर भी, आदतों की अपने यूँ कुछ मजबूरी है! गुस्से में भी सारी बात उनसे ही, एक दूसरे के खासे हम धतूरे हैं! अब भी ख़ासा सवाल ही हैं आपस में, आपसी समझ बनने को ये उम्र पूरी है! दोनों के अपने अपने मिज़ाज हैं, साथ कायम होने ये भी जरूरी है! बंजारों वाली तबीयत है, तरबियत भी, और फिर थोड़ा बहकना भी जरूरी है!

छियानवे बाईसी

बात तारीख की नहीं तारीख़ी की है, गौर कीजिए ज़रा बारीख़ी की है। साल छियानवे, महीना जून, मुकाम अहमदाबाद, अकेले थे 'हम' चन्द मुसाफिरों के साथ, थी पहली मुलाकात, हम तब भी रिश्तों के ज़ाहिल थे, और वो तब भी रिश्तों के क़ाबिल! फिर भी कुछ सुर मिल गए, कुछ ताल जम गई, और कुछ बाल रंग गए! वो दुनिया के अकेले थे, हम दुनिया के अजूबे, अलग रास्तों पर चलने के शौकीन, मुसाफिरी तो उसी वक्त शरू हुई, फिर धीरे धीरे रास्ते एक हुए, और हमसफ़र नेक हुए! बाइसों बाते हैं, चौबीस घँटे का साथ है घर की बात नहीं, काम की बात है, काम भी साथ है, अब हम ही मुश्किल हैं, एक दूजे को, ओ हम ही आसान भी, उलझन भी हम ही हैं, सुकूँ भी! सफ़र ज़ारी है, मंज़िलों के हम दोनों ही गुनहगार हैं, रास्तों के तलबगार! और अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें! अपनी राय और हमारी चाय में फर्क करें!

ऊंट की करवट, रंगे गिरगिट, तमाम गिटपिट, that's it!

रात आई है, और दिन को खबर करते हैं, कौन जाने मुट्ठी में कितने लम्हे बचे हैं, मेरे हालात मेरे होने को असर करते हैं शरमाते हैं, भरमाते हैं, आइना देखने से कतराते हैं, सवाल भी बेशरम हैं, रह रह कर सर उठाते हैं, एक और रात हो गयी, खुद को नज़र ना आ सका, फिर भी अपने साथ हूँ, कुछ खास हूँ, या खाक हूँ  ऊँट को बैठना ही है किसी करवट तो बैठेगा, भावनाएं दबाए रहिये, दिल किसी दिन ऐठेंगा ! कल किस करवट बैठेगा, 'आज' ये सोच कर ऐंठा है, शफक पर एड़ियों खड़ा है, कैसा चिकना घड़ा है? युँ गुम होने के लिये जगह कहाँ लगती है मेरे होने से ही तस्वीर बदलती है तस्वीर में रहुं पर नज़र् ना आयुं ये बात अपने रंगों को कैसे समझाऊं मेरे फलक, मेरे खुदा, कहाँ आपसे हैं ज्यादा जुदा ! नवाज़िश आपकी,रवायत खाक की, यही हैं मेरी दवा. आप देख सकते तो कहते रौशनी की कमी नहीं, नज़र आने के लिये फ़िलहाल दूसरी जमीन नहीं ! आप दौड़ते हैं, और खुद को पीछे छोड़ते हैं इंसान होना भूल गए? क्यों पीठ मोड़ते हैं? आँखों का अँधेरा गर रात हो जाये ख़ामोशी से ही सारी बात हो जाये

अज्ञातमित्र

मैं अज्ञात हूँ थोडा बहुत विख्यात हूँ  किसी दिन अपनी जीत हूँ किसी दिन अपनी मात हूँ अपने ही मुहं से निकली हुई बात हूँ  चाँद का इंतज़ार करती रात हूँ शतरंज पर बिछी हुई बिसात हूँ अपनी ही शह को दी हुई मात हूँ मर्द जात हूँ जात निकला जमात हूँ न बोला जो कभी वो ज़ज़्बात हूँ कहने को ये सब तो फिर क्यों अज्ञात हूँ बची हुई स्याही, अनकही लिखाई दवात हूँ मित्र हूँ अधूरा है जो अभी वो चित्र हूँ लकीरें है आकार नहीं रंग है पर रंगत नहीं पंक्तियाँ है पर पंगत नहीं साथी है पर संगत नहीं मैं अधुरा हूँ इस विचार में पूरा हूँ थोडा गोरा, थोडा भूरा हूँ बचे हुए लड्डू का चुरा हूँ अपने ही हाथ में दिया कटोरा हूँ जो सामने आया वही बटोरा हूँ सारी परम्पराओं का ठिठोरा हूँ! नयी बातों को नौजवान छोरा हूँ जहन में समंदर हैं फिर भी कागज कोरा हूँ !

शुरुवात अधूरेपन की

आज एक और शुरुवात, अब और भी कुछ अधूरा होगा आपका साथ है तो कौन जाने किस करवट सबेरा होगा बात दिल कि क्यों किसी तक पहुँचाएं, जो मेरा है वो सच जरूर तेरा भी होगा! कहते हैं सदियों से कि दिया तले अंधेरा होगा, लाजिम है देखने वाली नज़रों को फ़ेरा होगा? मैं बस अपनी समझ का ठेका लूँगा इसमें क्या किसी से राय-मशवरा होगा? अपने कई अंदाज़ों से मैं भी अजनबी हूँ, दो मुलाकात में न सोचें एक सच पूरा होगा! अक्सर वो मुझे मेरी कमियाँ गिंनाते हैं, अधुरा करते हैं ये सोच के कि पूरा होगा! यूँ नहीं कि अपनी खामियों को अज्ञात हैं पर सफ़र में वो सामान नहीं मेरा होगा!