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धूप छाँव के खेल!

धूप छाँव के खेल हैं सब, जीते क्या हारे?  नाप-तोल की दुनिया के  हम सब बेचारे! धूप छाँव के खेल हैं सब, किस करवट क्या हो? किस मोड़ मुड़ें, क्या चाल चलें, रुख क्या हो? धूप छाँव के खेल ये सब, अब आप बताएं?  सच के ही सब खेल क्या जुगत बिठाएं?  धूप छाँव के खेल, और हर चीज़ खिलाड़ी,  जो बनता होशियार है बस वही अनाड़ी! धूप छाँव के खेल हैं सब, पलक झपक ले प्यारे!  एकही सच पर टिके जो सब, वो मत के मारे!! धूप छाँव के खेल हैं सब, किस ओर चलें?  क्या संग, किस रंग, किस ढंग कौन मिले? धूप छाँव के खेल हैं सब, किसके हिस्से क्या आए? सवाल ये भी आएगा, 'आप! क्या अपनी जगह बनाए?

सर्दी और सुबह!

फिर आ गयी सिरहाने से, एक सुबह जाग उठी है! आज सुबह बस आई सी है, कुछ ज्यादा अलसाई सी है! छुट्टी मांगी नहीं मिली, सूरज की भी नहीं चली! गुस्से से लाल पीला है, जागा अभी अकेला है! पुरे दिन पर सुबह छलकी पड़ी है, धुप तेज पर सर्दी को हल्की पड़ी है! सर्द रातों को सबक सिखाने, बद्तमीज सुबह जरुरी है?  सर्दी में सुरज की बदतमीजी बड़ी हसीन है, बेशर्म हो कर ज़रा धुप को छू लेने दीजे!! सुबह शाम है और दिन रात भी, सब कुदरत है और करामात भी!

रंग और रंगत!

रंग क्या हैं? नतीजा हैं या वज़ह हैं, बने हैं या बनाए हैं? आख़िर कहाँ से आए हैं? करिश्मा हैं या कैरिसमा क्या अच्छे बुरे हैं? हल्के-गहरे हैं! कम-ज्यादा? अकेले चलते हैं या साथ, रंगों में कुछ अकेला भी होता है क्या? ख़ुद में पूरा, कोई कसर नहीं, दूसरे का रत्ती असर नहीं? पीला, थोड़ा हरा भी होता है? नारंगी ज़रा सुनहरा? क्या लगता है? रंगों की हमेशा लड़ाई चलती होगी? एक दूसरे पर हावी होने को? खासतौर पर सूरज डूबते? शायद उनका दंगा होता होगा, खुली छूट, मार काट? तभी शायद अंधेरा आता है? और बेशर्मी देखो! अगली सुबह फिर शुरू, और बादल आएं तो मत पूछो पर्दे के पीछे से क्या क़त्लेआम, अक्सर लगता है, भगवा ने किया सबका काम तमाम सब भगवा, बाकी सब भाग गया? पर रात! कहाँ कभी पूरी काली होती है? आख़िर चांदनी का ख़ालिस, गहरा सफेद, उसी घुप्प काले के साथ है, क्या लगता है क्या उनके जज़्बात हैं? सदियों से चलती लड़ाई? कभी भी न रात पूरी काली हो पाई न ही चांदनी, काले के मुँह रोशनी पोत पाई! कहीं ऐसा तो नहीं सारे रंग मिले हैं? चाल चलते, हम...

अंधे आसमाँ 1

मैं आकाश का काश! मेरे आकाश मेरी जमीं हाथ कुछ भी नहीं और मैं अधर में अपने यकीन पर शक ओ दुनिया के बताए झूठ से ललचाया , मैं हूँ अपना ही साया , अपने अंधेरों की परछाई , सच्चाई कभी रोशनी में नज़र ही नहीं आई! हिम्मत है? अंधेरों के सच जानने की? अपनी रूह को नापने की? अपनी खाल उधेड़ने की ? अपना खून समेटने की? सच तो हर जगह है , कहाँ देखूं?

रोशनी की साज़िश

तमाम रोशनी,  रास्ता रोशन करते! रास्ते किसका? कौनसा? किसके वास्ते? और जो दिख नहीं रहे? रोशनी के एकछत्र राज्य से, गुमनामी का शिकार, उन रास्तों का क्या? रोशनी चौंधियाती है,  मरीचिका,  आपको बुलाती है, और वो भी सतरंगी! चुनने की चुनौती,  और दौड़ में,  आगे रहने की पनौती, क्या आप अपने अंधेरों को जानते हैं? उनसे बात करते हैं या फिर जज़्बात? फिर कौन सी रोशनी चुनेंगे? कौन सा रास्ता? अपने अंधेरों को सुनेंगे या  चमक को गुनेंगे ? अंधेरों में आईने नहीं बोलते,  आप और आपके सच,  साथ  होते हैं, और  आप आप होते हैं! बाहर की रोशनी चमक है,  अंदर होगी तो आप रोशन होंगे! आपकी क्या समझ है?

रोशन समंदर!

तमाम अँधेरे, तिनका तिनका रोशन कोने, उम्मीदों को तकिया, इरादों को बिछोने, बस यही है सब कुछ, और जो बाकी है वो आज़ाद मर्ज़ी, फ्री विल, कोशिश और कशिश, हमसफ़र बनते हैं, कभी कोशिश रास्ता, कभी कशिश साहिल, बेबसी ज़ाहिल, सब नज़र है, कहाँ, किसको क्या, असर है, ज़द्दोज़हद जिगर है, और ज़िरह भी, हालात से, खारिज़, आप जी सकते हैं, शर्तों पर, अपनी, जी भर के!

तलाश, तलाश की!

वो रोशन रात थी या उज़ालॊं की लाश थी बुलंद इमारत, कामयाब इबारत, अंदाज़ जश्न के, और इतनी रोशनी कि सच्चाई जल गयी, ठिठुरती बेबसी अधनंगी सी, कैसे पल गयी, "काश” होती एक जिंदगी, जैसे गड़्ड़ी से फ़िसल गया ताश कोई, बेसब्र नज़र इस आस में‌, कि मिलेगी तलाश कोई, और हम बस चल रहे हैं, एक और शाम, और हम निगल रहे हैं, अंदाज़ भी है, एहसास भी, इरादे भी, फ़िर भी सहारा दे नहीं पाती, तिनका हुँ? पर खुद भी बह रही हुँ, किनारा होने को . . . . क्या नहीं दे दुं! नज़रें बेबस से नहीं मिलीं, पर खुद की बेबसी संभल गयी, एक रास्ता नहीं मिला, पर अपनी सुबह को रोशनी दिखा दी, कैसे कहुँ मज़बुरी थी, मेरी नज़रॊं ने आज़ मेरी उम्मीदें जगा  दीं ! आमीन ! (किसी की एक शाम की चहलकदमी से चुराये हुए ज़ज्बात)