मैं आकाश का काश! मेरे आकाश मेरी जमीं हाथ कुछ भी नहीं और मैं अधर में अपने यकीन पर शक ओ दुनिया के बताए झूठ से ललचाया , मैं हूँ अपना ही साया , अपने अंधेरों की परछाई , सच्चाई कभी रोशनी में नज़र ही नहीं आई! हिम्मत है? अंधेरों के सच जानने की? अपनी रूह को नापने की? अपनी खाल उधेड़ने की ? अपना खून समेटने की? सच तो हर जगह है , कहाँ देखूं?
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।