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अभी यहीं। !

मौजूद हूँ हरसू, जहाँ से शुरू हुई, जहाँ विलीन, कहीं पतली लकीर, कहीं कुदरत की शमशीर झरना बन गिरती हुई, कहीं चारों तरफ फिरती हुई, समंदर में खोकर, कहीं मैंमय होकर! जहां भी हूँ, अभी, इस लम्हा हूँ, जीवित, ज़िंदा, जिंदादिल, न में काल थी, न कल होउंगी, इसी एक पल में, हूँ भी और गुम भी, अपनी परछाई नही हूँ! इस जगह और हज़ार मील दूर, मैं ही हूँ, और इसी घड़ी, कहीं उमड़ी, कहीं उफ़ान, कहीं सिमटी, कहीं वीरान और ये सब सच है,  इसी दौरान, आप क्यों हैं परेशान, हैरान,  आँसू, मुस्कान? जो जब है तभी सच है! कितना आसान सचमुच है! बहते रहिए! पर, अगर आप यादों में अटके हुए हैं, तो मुमकिन है सच से भटके हुए हैं, In awe of these words"..the river is everywhere at the same time, at the source and at the mouth, at the waterfall, at the ferry, at the current, in the ocean and in the mountains, everywhere, and that the present only exists for it, not the shadow of the past, nor the shadow of the future.." Siddhartha by Hermann Hesse. ...

पास समंदर!

 पास समंदर  और दूर तक, साथ भी ओ अपने आप भी, मिले भी ओ अंजान भी, पहचान हुई, बस नाम की, किनारे ज़रा तर लिए, चुल्लू भर लम्हे लिए, आए ओ गुज़र लिए, ठहरना क्या है? क्यों है? सफ़र भी घर है, रास्ते कभी, किसी को रोकते नहीं!! चलिए, बह लीजिए!

बहना-ठहरना

नदियां अगर साहिल को तलाशें तो क्या कभी बह पायेंगी और समंदर बन पायेंगी? स्थिरता, ठहराव ये सब बस मरुस्थल की परिभाषा है जो प्यासा रहना भूल गया पृथ्वी के एक टुकड़े का अर्थहीन सन्यास सब से अलग रहना यानि खुद को भ्रम में रखना सब में रहकर जो अलग हो तो कुछ बात बने  लालसाओं से दूर जाना अलग लालसाओं को ठुकराना अलग नदी से सीखो, उसे अगर  किनारे पर पहुँचने का लालच आ जाये तो तालाब बन जाये, संमदर कभी नहीं रुको नहीं, नदी की चाल पहचानो बहो नहीं_ _ _ बहना सीखो  स्थिरता!  रुकने में नहीं, ठहरने में नहीं बहाव के रुख को पहचानने में है स्वयं एक धारा बनने में है इस विचार को उस विचार से मिलने दो धाराओं के मेल को नदी बनने दो रुको नहीं बहो आज बनती है नदी, तो कल संमदर बनने दो !