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जिंदगी ज़हर!

जिंदगी ज़हर है इसलिए रोज़ पीते हैं, नकाबिल दर्द कोई, (ये)कैसा असर होता है? मौत के काबिल नहीं इसलिए जीते हैं, कौन कमबख्त जीने के लिए जीता है! चलों मुस्कुराएं, गले मिलें, मिले जुलें, यूं जिंदा रहने का तमाशा हमें आता है! नफ़रत से मोहब्बत का दौर चला है, पूजा का तौर "हे राम" हुआ जाता है! हमसे नहीं होती वक्त की मुलाज़िमी, सुबह शाम कहां हमको यकीं होता है? चलती-फिरती लाशें हैं चारों तरफ़, सांस चलने से झूठा गुमान होता है! नेक इरादों का बाज़ार बन गई दुनिया, इसी पैग़ाम का सब इश्तहार होता है! हवा ज़हर हुई है पानी हुआ जाता है, डेवलपमेंट का ये मानी हुआ जा ता है।

रास्ते, मुसाफ़िर और कंकड़!

आज हमने एक शहर देखा , उगला हुआ जहर देखा , मुसाफिर बन गुजर गए , हमने कहाँ वो असर देखा कितने रास्ते आज कुछ वीरान हैं ,  मुसाफ़िर तुम आज मेहमान हो , कितने सफ़र उसने कर दिये काबिल , आज समंदर हो गये तुम ओ ' साहिल रस्ते भी हैं और निशान भी ,  यकीं भी है या गुमान ही , नज़र आयेगें खुद को किसी मोड़  पर , बना रखिये पहचान भी . कुछ एक सफ़र , कोई नेक डगर , मासूम असर , मुस्तैद नज़र  कुछ साथ चले , कोई हाथ मिले , कुछ दिल को लगे , ऐसी है खबर ! चलो कुछ ऐसे सफ़र करते हैं , चंद लम्हों कों जिगर करते हैं , उठते रहें कदम यूँही , हम कहाँ  'क्या अंजाम' ये फिकर करते हैं ! कदमों में उम्मीद बंधी है , कोशिशों से रास्ते जुड़े हैं , ज़रा शुरु करिये सफ़र को , यकीन मोड़ पर खड़े हैं ! सफ़र तब्दिली के मुकम्मल नहीं होते ये शौक फ़िर भी जायज़ हैं , दुनिया लगी है सब को उगाने में शुक्र ! सब फ़सल नहीं होते !