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चलो खेलते हैं!

चलो खेलते हैं, उन सब बातों से, मुलाकातों से, जज्बातों से, हालातों से, सौगातों से, जो बोझ बनती हैं, खेलते हैं, मर्यादा से, चरित्र से, परंपरा, मान्यता, जो जंजीर बनती हैं, चलो खेलते हैं, जंजीरों से, जो हमें कम करती हैं, किसी के रंग से, एक तय ढंग से, किसी के कद से, उम्र की हद से, जात, धरम, पद से, पैसे की मद से, चलो खेलते हैं उन बच्चों से, सब बच्चों से, जो सताए हुए हैं, डराए हुए हैं, भरमाए हुए हैं, तालीम के मारे हैं, पैसे बहुत सारे हैं, प्यार के बेचारे हैं, सदमे बहुत सारे हैं, चलो खेलते हैं, खुद से, अपने आईनों से, अपने मायनों से, उछाल देते हैं सब हवा में, देखें क्या हाथ लगता है? क्या वैसा का वैसा ओ क्या बदलता है? आपको चलता है? (पूना में हाल में हुए अनुभव आधारित शिक्षा की सालाना कॉन्फ्रेंस में प्ले फॉर पीस यानी खेल से मेल संस्था और प्रक्रिया के अभ्यासकर्ता स्वाति भट्ट, सिंधुजा और आज्ञातमित्र के सत्र का विषय था "खेल - जरिया अविरोध का" । इस सत्र का मकसद ये समझना था की कैसे खेल (प्ले फॉर पीस) के जरिए हम शोषण, हिंसा और सदमे से मुकाबला करने का सामर्थ बना सकते हैं। ) www.playforpeace.org...

याद रखना भूल है?

पैर के छाले हों, या खाली निवाले हों, लूट गए रास्ते में,  घर बैठे बेघर हो गए, जिस जमीन को सींच रहे थे बंजर वहां के मंजर हो गए, सब याद रखा जाएगा! उधर सफ़ूरा जेल में है, बरबाद वक्त को समझाती हुई कल फ़िर आएगा क्या भुला रही है सरकार वो याद रखा जाएगा! बचपन के खेल,  कंधे पर सवार, या सूटकेस सवार,  रोटी की गुहार, मां लाचार,  हाथ फ़ैलाए, करे पुकार हक़ जो भीख बन गयी वो याद रह जाएगा! ट्रेफ़िक सिग्नल वर्दी का इशारा जवान खून उबल गया,   ज़रा आगे निकल गया चालन नहीं कटा,  पत्ता कट गया,  कानून अपनी कर गुजर गया, सब भुला दिया जाएगा क्योंकि बात कश्मीर है  कन्याकुमारी नहीं! पिंजरा तोड़, सलाखों के पीछे हैं,  इंसाफ़ साथ में कैद है,  सही-गलत में भेद  न्यायपालिका खेद  दलील में छेद,  और एक कानून  फ़िर एक बार  पिंजरा तोड़, सलाखों के पीछे क्या याद रखें, क्या सीखें?

गुनहगारी कानून!!

मामूली है जो बो ही ख़ास भी है, आसमाँ में भी है आसपास भी है! हलक फूटे हैं हलाक के डर पर भी।    जो घुटन है वो आज तड़प भी है! हलाक - destruction,  slaughter फिक्र है जो वो बेफिकरी बनी है! सवाल है जो वो ही उम्मीद भी है!! सर फूटे हैं और सुर मिल रहे हैं! जहां दर्द है वहीं सुकून भी है!!  (हम देखेंगे, लाज़िम है के हम भी...) बांट दिया इतना के अब साथ खड़े हैं तरतीब में है जोश, वो ही जुनून में भी! ( तरतीब-in order) समझ है बहुत पर होशियार नहीं थे? वार करते हैं क्योंकि तैयार नहीं थे, वुजूद है जो वो ही बावुजूद भी है? जो कानून है वो ही गुनाह  भी है! बेड़ियाँ उनकी क्यों हमें मंजूर हैं? जो कन्याकुमारी वो ही कश्मीर भी है?!