आज फिर कोई मर गया! क्या हुआ? किराये का था घर, गया! सादा सा था सच क्यॊं सर गया हकीकत आपकी या कोई गैर है? पसंद आई तो अपनी नहीं तो बैर है? सच बुनियाद है! आपकी ही इबादत आपकी फ़रियाद है, ये कौन सा हिसाब है भरोसा, यकीं, आमीन कब से सौदा बन गया? आप के गम से सवाल नहीं हैं, पर आँसू समंदर की बूँद हैं, उनका दरिया क्यॊं? सफर जिनका था मुकम्मल हुआ, आज आपका है, कल, कल हुआ! (मौत की कुछ खबरें और उनसे होती व्यथा को देखकर)
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।