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इस दौर!

लाख़ ढूंढे मिलने वाले नहीं, कितने गिरे हैं कुछ इल्म नहीं! कहने और करने में फर्क जो है, ये फांसले कम होने वाले नहीं! बहुत सर चढ़ाया है तारीखों में, गिरेंगे अब, उतरने वाले नहीं! दुश्मनी जो रास आने लगी है, ये नशे, अब जाने वाले नहीं! जो सामने है वही सारा सच है, ये नया कुछ जानने वाले नहीं! नफरतों ने आबाद किया है, तुम बर्बादी अपनी मानने वाले नहीं! अपने ही हैं जो बहक गए हैं, सब वो अब अपना मानने वाले नहीं! उम्र का तकाज़ा देने वाले सब,  मानते हैं, अब जानने वाले नहीं!

पनपने के सच–बुढ़ापा

बचपन पनपता है, जवानी मचलती है बुढ़ापा ठहरता है, बुढ़ापा बुफे है उम्र का, इसमें सब शामिल है, बचपन की पुकार जवानी का जोश, गर आपको हो होश! समंदर है ये, लहरें जिसकी जवानी है, बूंद बूंद  बचपन की रवानी! बुढ़ापा, थकान नहीं है, रस्तों के मोड़ की पहचान है, ये आपके सोच का सच नहीं सोच, दुनिया की जागीर है, सही–गलत की जंजीर, अगर यूं बूढ़े हुए तो आप उम्र का शिकार हैं! बुढ़ापा साहिल है, तटस्थ लहरों को हर हाल भिगोने वाला, जोश जवानी का लिए जो आई उसे यकीन दिलाने वाला हां, तुमने डुबा दिया बुढ़ापा; वो जो न तौले, न मोले, न बोले, मंजूर करे, हर उम्र, हर हाल "हां, तुम चलते रहो" बचपन है तो बचे रहो, जवानी है तो बहो! बुढ़ापा भी मंज़िल नहीं है, एक उम्र का अंजाम, हां, जाम जरूर है, अगर खुद को मान लें, मान दें, सामान नहीं है जो उठाना है, बस एक और मोड़ है, हंसते हंसाते गुजर जाना है!

पनपने के सच – जवानी

बचपन पनपता है, जवानी मचलती है बुढ़ापा ठहरता है, जवानी में दिल बहुत मचलता है, मर्जी के रास्ते चलता है, अक्सर पिघलता है, अपने बस में है, पर बस कहां चलता है? जवानी जोश है, एक पुकार है, जिंदाबाद! जवानी तूफान है, कहां कोई थाम है, मुश्किल आसान है! बेलगाम है, एक ललक है, और लालच भी, उस हर ताकत का, जो लगाम लिए खड़ा है, क्योंकि उसे तूफान चाहिए, काम अपना आसान चाहिए! दुनिया को तूफान चाहिए, पर अपने लिए आसान चाहिए, इसलिए बना दिया है, उम्र बढ़ने को एक जंग, हमेशा चलने वाली लड़ाई, पहला नंबर आओ, पीछे रह गए तो और जोर लगाओ, आगे निकल गए तो, किसी की शाबाशी के गुलाम बन जाओ! लगे हैं सब नंबर वन होने में, ज्यादा हैं आप किसी के कम होने में? जवानी, खर्च होने की चीज़ नहीं तो गौर करिए, कोई आपको कमा तो नहीं रहा? नंबर – एक दो तीन गिनती बना तो नहीं रहा? बेलगाम रहिए, बेनाम सही, नाम होगा तो बिक जायेंगे, कामयाबी कांटा है मचली बाजार का, जवानी मचलती है, कैसे खुद को बचाएंगे?

झुर्रियां!

मुझे झुर्रियाँ चाहिए, अपने  चेहरे की महीन दरारों में, यादनामा लिखना है, ज़िंदगी  के गहरे ज़ख़्म  झुर्रियों की तमाम परतों में, ज़ाहिर उन नज़रों पर, जो मुझ पर टिकती हैं, और हर एक उगते सूरज से मिलता तोहफा, नई सांस भरने का, वो देखा!! एक दोपहर मैं इतना मुस्कराया मेरा पूरा चेहरा भर आया!! -विलो टैगान

नवीन मन, नव्य स्रजन

क्या बदलता है, समय के साथ, या समय के हाथ, हालात मुश्किलें,रास्ते,सोच, संभावनाएँ ,उम्मीदें ,आकांक्षाएं पहचान, और एक दिन कोई परिचित अजनबी, समय के दो ध्रुवॊ को एक लम्हा कर देता है, न पीछे मुडने की जरुरत न आगे बढने की चिंता, न कोई शुरुवात, न कोई अंत, जो मिले उसका भला, जो न मिले उसका भी भला, कितना नायाब है, रिश्तॊ में फकीरी का ये सिलसिला, हालत की अजनबियत ,  वक्त को बेदाग़ बना देती है, दिल साफ़ होते हैं , मैं, और मैं हो गया हूँ, तुम, और तुम हो गए हो, समय कितना भी बदले कभी बदला नहीं लेता, एक आज़ाद मुलाकात, उस मकाम पर, जहां किसी को, अपना रास्ता नहीं बदलना, न चाल चलनी है, अपेक्षा में TTMM(तेरा तू , मेरा मैं), अच्छा सौदा है! समय का गुलाम नहीं है,  अपनापन अच्छी मुलाक़ात रही, शुक्रिया! नविन मन, नव्या स्रजन (नवीन और नितिशा के साथ मुलाक़ात का विवरण)