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रिश्ते मैं तो हम आपके.....

रिश्ते ज़ंजीर है किसी को किसी को शमशीर हैं मज़ाक हैं किसी को किसी को पूड़ी खीर हैं किसी को मज़बूर करते हैं किसी को मजदूर किसी को चकनाचूर कोई फलता है,कोई पलता है सही रस्ते चलता है कोई घर से भाग निकलता है कोई इंसाँ से रखता है कोई इंसाँ से बचता है किसी को कुत्ता प्यारा है कोई घोड़े का चारा है कोई फूलों में रमता है कोई उड़ान भरता है बिन रिश्ते इंसान नहीं, जरुरत पर भगवान बनाता है मरे को शमशान बनाता है अपना काम आसान बनाता हैै मतलब का सामान बनाता है बुढ़ापे की लाठी घर की शोभा छाती का बोझा कलाई का धागा मस्त माल मख्खन जैसे गाल बाजारू खरीद दहेज़ के साथ मिली मुफ़्त चीज़ और रिश्ते खून के थाली में मिली नून के जी का जंजाल, खाल के बाल बोले सो सुनो कहे सो बनो, सपने बड़े चुनते हैं छोटे घुनते हैं रिश्ते आज़ाद करते हैं इरादों को बाज़ करते है कामयाबी को ताज करते हैं पीठ को हाथ करते हैं अकेले में बात करते हैं रिश्ते बांधते हैं रोकते हैं हर नए कदम को टोकते हैं पर काटते हैं, आपस में बाँटते हैं रिश्ते झगड़ते हैं, बिगड़ते हैं ...

रिश्ते, कड़वाहट और दो घूँट ज़हर!

तमाशा सारी बातॊं का, मेला रिश्ते नातॊं का बड़े काम का है समझो अब महकमा लातॊं का वो अपने, काम के हैं क्या, वो अपने काम के है क्या? सब अपने, नाम के हैं क्यॊं, सब अपने नाम के हैं क्या? पैदा किया तो बाप होते हैं, जबरन 'आप' होते है रिश्तॊं के नाम से न जाने कितने पाप होते हैं कभी पुरे नहीं पड़ते, अजीब उनके माप होते हैं वो "बड़े" बनते हैं उम्र के और हम खाक होते हैं  नौ महीने का अचार, कह दिया इस को मां का प्यार अपनी बात को आँसू चार, लाचार ममता या व्यापार? ममता है तो क्यॊं सिर्फ़ 'अपने' नज़र आते हैं? क्यॊं कर रिश्ते सारे खून से लकीरें बनाते हैं?  त्याग भी है और आँसू भी, और बेबसी आदत है, दुनिया ज़ुल्मी है, और हरदम इसकॊ दावत है! मर्द को जात कैसी, भुत को बात कैसी, बिन अंधेरॊं के रोशन कायनात कैसी?  आप तो मर्द है, ये मसला बड़ा सर्द है, ये कैदे उम्र है और लावारिस सब दर्द हैं! रिश्तॊं के आचार को मसाला नहीं लगता, ऎसे भी भुखे हैं कोई निवाला नहीं लगता! सारे रिश्ते खुन के, रिसते हैं तमाम उम्र, बेखबरी जख्मॊं से कैसे हो वहशियत कम! अपनी मुस्कराहट से ...