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कभीकभार

कभीकभार, अगर आप सजग हो जंगल से गुजरें,   सांस लेते, उन पुरानी कहानियों की तरह,   किस के लिये मुमकिन है झिलमिलाते पत्तों के उपर से बिन आहट गुजर पाए   आप उस जगह पर होंगे जिसका एक ही है काम,   आपको हैरान-परेशान करना ज़रा ज़रा सी मामूली, और दिल-दहलाने वाली गुज़ारिश करके, न जाने कहां से सूझी और अब चारों तरफ़ हाथ फ़ैलाते।   गुज़ारिश ये, कि फ़िलहाल जो भी कर रहे हो उसे रोक दो,  और रोक दो वो बनना, जो तुम बन रहे हो, उस काम में ड़ूबके सवाल, जो एक ज़िंदगी बनाते या बिखेरते हैं,   सवाल जिन्होंने बड़े सब्र से आपका इंतज़ार किया है, सवाल जिनको कोई हक नहीं, कि वो ज़ाया हो जायें! - ड़ेविड व्याईट  (अनुवाद -  David Whyte from Everything is Waiting for You ©2007 Many Rivers Press)

तलाश

मंजिल कि खबर कैसी, रास्तों का पता क्या? खो जाना कोई मर्ज नहीं, फिर उसकी दवा क्या? क्या समझेंगे जिनको जंजीरें रास्ता दिखाती हैं जिनकी हर सुबह को शाम आती है, उन लम्हों का क्या जो खत्म नहीं होते? उन चोटों का क्या जो कभी जख्म नहीं होते? हर आह का मतलब क्यों? हर वाह का हिसाब क्या? कुछ रस्ते चलने से तैयार होते हैं! और नक्शों पर सिर्फ कल रहता है! सवाल बेमानी है अगर कोई हल रहता है, वो खोज ही क्या जो खजाने पर खत्म हो? रुकिए तभी जब सामने कोई प्रश्न हो??