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मेरे अंदाज़ या अंदाज़न मैं?

सुबह के बाद शाम जब मिलता हूँ खुद से , बड़ा अजनबी सा नज़र आता हूँ !  चलो कुछ नए अंदाज़ करते हैं , दो तीर कैसे तीरंदाज़ करते हैं ?  आज मैं कुछ भी नहीं हूँ , ये शुरुवात अच्छी है !  हम मुफ़्त में बंट रहे हैं , लोग भीड़ से छंट रहे हैं कोई मोल करता है कोई अनमोल करता है जो भी करे ज़माना बहुत तौल करता है ! नए अंदाज़ होने को नए अलफ़ाज़ नाकाफी , रूख बदलो किसी हकीकत का फिर बोलो !  मैं वक्त के हाथों फिसलता जाता हूँ , हूँ वही पर बदलता जाता हूँ !  लड़ते-झगड़ते, बनते-बिगड़ते, संभल जाएँ तो शायरी है!

नये अंदाज़!

फिसलते लब्जॊं को थामना पड़ता है, लम्हॊं का यूँ ही शायरी नाम पड़ता है कहाँ जाना है?.. छूने को एहसास करें, चलने को ही प्यास करें, चलो नए अंदाज़ करें, अब सपनो को पास करें नहीं तो .. मुश्किल होने से, मैं कुछ कम नहीं होता,  गमगीन हो साये, पर मैं  rum नहीं होता मुसाफिर होने के मेरे अंदाज़ ऐसे हैं कोई मिले-बिछडे मैं अधुरा कम नहीं होता सुना है ? क्या बात है कि अपने शब्दॊं का मैं साथ नहीं देता ? उन लम्हॊं पर क्या गुजरे जिन्हें मैं रात नहीं देता, आपकी आवाज़ मेरे कहने को अंजाम देती है वर्ना ये शायर अज्ञात को कभी मात नहीं देता! तबज्ज़ो का शुक्रिया, वर्ना हर कोशिश आवाज़ नहीं होती! कोशिश ... कब निकले तेरे अरमान,  की ख्वाइश बन गयी आसमान, इरादॊं  के सफ़र की जरा ऊंची कर उड़ान  क्यॊं परेशां होते है शब्दॊं के पहलवान, शायरी बेहतर अगर, लफ़्ज़ॊं की वर्जिश में आये जान उम्र का काम बड़ना है बड़ेगी, मुश्किल होगी, गर तू लम्हे खर्च करने से डरेगी   तजुर्बे ज़िन्दगी को कहीं पुराना ना कर दें चल आज फिर कुछ नया कर दें!   Embrace al...