छाए हुए या समाए हुए, अपनी धुन में रमाए हुए, दुनिया को अपना बनाए हुए, बन-संवर कर आए हुए, न बने हुए न बनाए हुए, यूँही बस एक शाम को, निकल आए बस नाम को, हक़ीकत के समझान को, उम्मीद के अजमान को, काहे तुम नज़र झुकाते हो, क्यों किस्मत को आज़माते हो, क्यों झूठ मूठ हो जाते हो, रंग जाओ, रंगत लाओ रम जाओ, सच सामने है!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।