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गणमंत्र दिवस स्वाहा!

देवी है, माता है, इज़्ज़त है हर 'मर्द' की, फिर भी दवा नहीं कोई इसके दर्द की (बलात्कार जैसे देश की संस्कृति है) कोई देशभक्त गुंडा गाली देगा इसका भय है मज़बूरी में कहते जय जय जय जय है! (सिनेमाघर में डर के मारे देशभक्त बनाये जा रहे हैं) भेड़िये भेड़ बने हैं, तोड़ मस्जिद नफ़रत पालते हैं, मज़हब का सब पर जाल डालते हैं। (आर एस एस) भीड़ में सब खड़े हो गए, खासे चिकने घड़े हो गए, सोच के दड़बे हो गए, 'एक' के टुकड़े हो गए (भक्त जो विविधता का खून कर रहे हैं) बाबरी की छत टूटी, संविधान की इज्जत लूटी, अब सत्ता में हैं, देश कि तो किस्मत फूटी! (आप खुद समझदार हैं) पूरा मुल्क सावधान है, तहज़ीब को विश्राम है जिसने सर उठाया उसको काले रंग का नया ज्ञान है! (विरोध अब हिंसा है, जो हट कर बोले उसको मुँह काला कर घरवापस करते हैं) जन जन क्या मन है? क्यों इतना पिछड़ापन है?? (आपको विकास दिखता है या गांव और स्लम में उसका अवकाश) जय जय जय जय है, क्यों देशभक्ति का नाम भय है? ( क्यों हम इतने डरे हैं कि किसी के सवाल उठाने से आक्रमक हो जाते हैं) भारत माता की जय, रोज़ खबर है, अच्छाई पर ...