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सुबह!

उस मोड़ पर सुबह थी,  उस छोर पर सुबह थी, किसी रात की सुबह थी, कुछ बात है सुबह थी, घनघोर बादल के साथ, या उन्हें छोड़ कर सुबह थी? बावजह थी या बेवजह, सबके साथ ये सुबह थी.. आप कहां हैं, कहां आपकी सुबह थी? जाग रही थी साथ,  या दूर भागती सुबह थी? उस मोड़ पर हम थे, हाथ आयी सुबह थी, मिला रही थी कांधे, एक रास्ता सुबह थी, दिला रही थी यकीन, सहर से शाम सुबह थी, रखी थी पीठ पर हाथ, बड़ी इफरात सुबह थी!

कशमकश कश्मीरियाँ

  Kashmir

कत्ल–ए –ख़ास!

हिन्दुस्थान ने भारत का कत्ल कर दिया, हथियार पर धर्म की धार थी, जय श्री जय श्री उसकी ललकार थी, जुबां पर खून तो पहले ही चढ़ा था, बहती गंगा में सब ने हाथ लाल किए, सवाल पूछने वालों के गले कमाल किए मिठाइयां बंट रही हैं, जश्न मन रहे हैं, भक्ति के नए मतलब निकल रहे हैं, अहंकार से अब भगवा मल रहे हैं, हरे को हरी के रंग में ढाल दिया है, हिंदुत्व ने बड़ा कमाल किया है!!

समंदर अहंकार!

साहिल डूब रहे हैं अपने ही समंदर से, और सर चढ़े समंदर को शऊर कहां? बिखर कर खो जाओगे समंदर, इल्म है? बूंद से सीखो ऐसी तुमको नज़र कहां? भूल कर शुरुवात, अंत को इतराते हैं? मील के पत्थर हो तुम, मुसाफिर कहां? पहाड़ों को जज़्ब करके अट्टहास क्यों? वही बन गए जिसको तुम गिराते हो? एक ही रंग में भिगो दिया सबको? मुरख! अपनी ही पहचान गंवाते हो? वो बाबरी थी ओ तुम भी बावरे निकले? कट्टरता कहते थे (जिसको) वही दिखाते हो

बेवजह सांसे!

  ज़िंदा हूं जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूं, अपनी बेशर्मी में पनाह लिए जा रहा हूं! उम्मीद भी नहीं बची और यकीन भी यतीम है, इस बेबसी को अपनी शमा किए जा रहा हूं! रोशनी भी है और तपिश भी अभी बाकी है, ख़बर नहीं किसको फना किए जा रहा हूं? जाहिर है वो सूरज भी रोशन होगा एक दिन, क्यों हालात को गुमां किए जा रहा हूं? नहीं आना है इस नामाकुल दुनिया में हरगिज़, क्यों फिर इतना पशेमान हुए जा रहा हूं? सिफ़र होने की तमाम कीमतें हैं इस उम्र, क्यों रिश्तों को सामान लिए जा रहा हूं?

हाथ पर हाथ!!

मर्द बने बैठे हैं हमदर्द बने बैठे हैं, सब्र बने बैठे हैं, बस बैठे हैं! अल्फाज़ बने बैठे हैं आवाज बने बैठे हैं, अंदाज बने बैठे हैं, बस बैठे हैं! शिकन बने बैठे हैं, सुखन बने बैठे हैं, बेचैन बने बैठे हैं, बस बैठे हैं! अंगार बने बैठे हैं तूफान बने बैठे हैं, जिंदा हैं शमशान बने बैठे हैं! शोर बिना बैठे हैं, चीख बचा बैठे हैं, सोच बना बैठे हैं बस बैठे हैं! कल दफना बैठे हैं, आज गंवा बैठे हैं, कल मालूम है हमें, फिर भी बस बैठे हैं! मस्जिद ढहा बैठे हैं, मंदिर चढ़ा बैठे हैं, इंसानियत को अहंकार का कफ़न उड़ा बैठे हैं! तोड़ कानून बैठे हैं, जनमत के नाम बैठे हैं, मेरा मुल्क है ये गर, गद्दी पर मेरे शैतान बैठे हैं! चहचहाए बैठे हैं,  लहलहाए बैठे हैं, मूंह में खून लग गया जिसके, बड़े मुस्कराए बैठे हैं! कल गुनाह था उनका आज इनाम बन गया है, हत्या श्री, बलात्कार श्री, तमगा लगाए बैठे हैं!!

गलत हिंद ई!

रम पराम पराम, उठे सबके कदाम, एजी ऐसे गीत जाया करो, अराम हेराम है, शराम बेशराम है, एक ही बज़ रंग हैं सब, और बड़े बदरंग हैं, दंग_आ नियत में रम गया है जैसे, सलाम का गला धड़ से कलम है, जयश्री रम गई है गटर की चकाचौंध में, कीचड़ नराम है सेज बनी सम विधान विषराम है,   अराम हेराम है, शराम बेशराम है, भग, वाह वाह हो रही चहुँ और, दंगआराम है,   समाचार व्यभिचार है, सच्चाई भक्त बनी है धूनी रामाए सारे दुष्कराम ही रम गए है कण कण, रम गए हैं, रम पराम पराम उठे सबके कदाम, योद्धा के सब धंधे हैं, बेसराम के बढ़े चंदे हैं डर से सब गंदे हैं, बदरंगी बंदे हैं! रम पराम पराम, उठे सबके कदाम, अजी ऐसे गीत जाया करो!

बॉडी लैंग्वेज

अकेले हैं,  कुछ ऐसे ही अपने मेले हैं, फिर भी भीड़ कम नहीं,  ख्यालों के रेले पेले हैं जाने कहां कहां धकेले हैं नज़रों की धक्का मुक्की है, बिन बोले कहीं ये रुक्की हैं कदमों की अपनी मर्जी है, अपनी चाहत के दर्जी हैं हाथ खड़े हो जाते हैं, थक जाते हैं थम जाते हैं और कान लड़े ही जाते हैं, हमको नहीं सुनना ये दुनिया, अब मुंह को कौन संभाले है, भटके है जहां निवाले हैं! नाक न नीची हो जाए, बड़े तहज़ीबी हवाले हैं! एडी, घुटने, कंधे, कोहनी अपनी जुबान ही बोले हैं भीड़ बहुत और कोलाहल, पहचाने सब बोले हैं, साथ हैं सब, मजबूरी के, इस साथ के सब अकेले हैं, कहने को सब मेले हैं!

कुछ होना है!

"कुछ होना है" खेल है, दुनिया का! आप खिलौना हैं! सच तमाम है,  झूठ बोलते, उसके सामने आप बौना हैं! आप कम है, क्योंकि कोई ज्यादा है, खेल घिनौना है! कंधे किसी के सीढ़ी किसी को कामयाबी भी बोझ ढोना है! तराज़ू किस के, नाप किसका बाज़ार बड़ा है, आप नमूना हैं! रंग फीका है, ऊंचाई टीका है, वज़न ज्यादा कम मुश्किल होना है! "मैं" पहचान, पीड़ा, अभिमान, बड़ी तस्वीर, आप एक कोना हैं!

पहचानें!!

अपनी नजर से खुद को देख पाएं कभी ऐसा एक आइना बना पाएं! शोर बहुत है मेरी नाप तौल का , कोई तराज़ू मेरा वज़न समझ पाए? छोटा बड़ा अच्छा बुरा कम जादा, वो सांचा कहां जिसमें समा जाएं? नहीं उतरना किसी उम्मीद को खरा! जंजीरें हैं सब गर आप समझ पाएं! मुबारकें सारी, रास्ता तय करती हैं, 'न!' छोड़! चल अपने रास्ते जाएं!! वही करना है जो पक्का है, तय है? काहे न फिर बात ख़त्म कर पाएं? अलग नहीं कोई किसी से कभी भी, ज़रा सी बात जो ज़रा समझ पाएं!!

आसान मुश्किल!

ये जो मेरे जमीन आसमान हैं, ये ही मेरे सपनों के सामान हैं! मुझे कहां पंख लगते हैं, उड़ने? वहीं हूं जहां मेरे अरमान हैं! वो ढूंढे जमीं जो आसमान हैं! पैर कहते हैं पुरानी पहचान है!! फिक्र कहां, कब कहां पहुंचेंगे? चल दिए, वही अपना अंजाम है! खोए हैं, अपनी ही तलाश में, कौन कहता है काम आसान है? बनावट, दिखावट, सजावट सब, महंगा सामान ओ सस्ती दुकान है! अक्स है वो, सब जो तराशते हैं! कब समझेंगे बदलता मकान है!

ज़िन्दगी ख़ाक की!!

ज़िन्दगी दावत है, किसी को... बग़ावत है किसी की ? आदत है, किसी की मुश्किल, और कोई आसान, काम किसी का, नाम कोई बदनाम, मुफ़्त पहचान सरेआम, अकेले, भीड़ में, दौड़ रोज़ की, होड़, काहे? बेपरवाह, आगाह? अपने सफ़र से, दोस्ती, अजनबी मुसाफ़िर से, चलते रास्ते आपके, भांप के, नाप के किसी और के? किस छोर के? सहारे, या यकीन मंझदारे? सह रहे हैं या बह रहे हैं, ख़ामोश या कह रहे हैं? अपनी बात,  ज़िंदगी ज़ज़्बात, क्या परवा साख की? आखिर ज़िन्दगी ख़ाक की!!