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ईबारत ए सफ़रनामा

बैठेंगे किस करवट, सौदे सफ़र के, रास आयेंगे सवालात दर-बदर के? ज़िंदगी आसान करते हैं मुश्किलें मेहमान करते हैं जो करें ज़ी-जान करते हैं वो और हैं जो नाम करते हैं!  निकल पड़े एक और ड़गर, एक और सफ़र झोली भी बदल गयी और नया समान भर, इतनी मुलाकातें जज़्ब है दिलो-दिमाग के घर घर जायेंगे पर अब वो अज़नबी शहर-नज़र  मुसाफ़िर कदमों को गिनें, कि रास्तों को चुनें, गुजरें अज़नबी बन कि, नये रिश्ते कुछ बुनें! फ़िर नया सामान है, कंधों में वही जान है, कदम चल रहे हैं अपनी धुन, और क्या काम है? बह गये पानी में सारे शिकन पेशानी के, युँ मिल गये रास्ते, सब को आसानी के!  युँ भी गुजरे हैं रास्ते, रस्तों से आज़, अपनी ही पहचान का कहां अंदाज़, बुंदें समंदर हुयी जाती है, मज़े लुट रही हैं, हर कदम हकीकतें आज़! आवारा कभी भी थोड़े कम न हो हालात कभी ज्यादा गम न हो अज़नबी रास्तों की मुश्किलें अच्छी, ज़ज्बा-ए-बंजारगी कभी कम न हो! हमसफ़र हैं पर साथ नहीं देते, रस्तों को ज़जबात नहीं देते रुकी हुई हैं कितनी सुबहें, क्यों कदमॊं को अंदाज़ नहीं देते? कुछ शोर है कुछ खामोशी भी, कुछ होश है, और मदहोशी भी, अकेले स...