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जिंदगी ज़हर!

जिंदगी ज़हर है इसलिए रोज़ पीते हैं, नकाबिल दर्द कोई, (ये)कैसा असर होता है? मौत के काबिल नहीं इसलिए जीते हैं, कौन कमबख्त जीने के लिए जीता है! चलों मुस्कुराएं, गले मिलें, मिले जुलें, यूं जिंदा रहने का तमाशा हमें आता है! नफ़रत से मोहब्बत का दौर चला है, पूजा का तौर "हे राम" हुआ जाता है! हमसे नहीं होती वक्त की मुलाज़िमी, सुबह शाम कहां हमको यकीं होता है? चलती-फिरती लाशें हैं चारों तरफ़, सांस चलने से झूठा गुमान होता है! नेक इरादों का बाज़ार बन गई दुनिया, इसी पैग़ाम का सब इश्तहार होता है! हवा ज़हर हुई है पानी हुआ जाता है, डेवलपमेंट का ये मानी हुआ जा ता है।

कत्ल–ए –ख़ास!

हिन्दुस्थान ने भारत का कत्ल कर दिया, हथियार पर धर्म की धार थी, जय श्री जय श्री उसकी ललकार थी, जुबां पर खून तो पहले ही चढ़ा था, बहती गंगा में सब ने हाथ लाल किए, सवाल पूछने वालों के गले कमाल किए मिठाइयां बंट रही हैं, जश्न मन रहे हैं, भक्ति के नए मतलब निकल रहे हैं, अहंकार से अब भगवा मल रहे हैं, हरे को हरी के रंग में ढाल दिया है, हिंदुत्व ने बड़ा कमाल किया है!!

समंदर अहंकार!

साहिल डूब रहे हैं अपने ही समंदर से, और सर चढ़े समंदर को शऊर कहां? बिखर कर खो जाओगे समंदर, इल्म है? बूंद से सीखो ऐसी तुमको नज़र कहां? भूल कर शुरुवात, अंत को इतराते हैं? मील के पत्थर हो तुम, मुसाफिर कहां? पहाड़ों को जज़्ब करके अट्टहास क्यों? वही बन गए जिसको तुम गिराते हो? एक ही रंग में भिगो दिया सबको? मुरख! अपनी ही पहचान गंवाते हो? वो बाबरी थी ओ तुम भी बावरे निकले? कट्टरता कहते थे (जिसको) वही दिखाते हो

पागलपन

दिमाग खराब हो गया है, सीधा हिसाब हो गया है! नफरतें वाज़िब बन गई हैं! शराफत नकाब हो गया है! पागल चीखते हैं मरामराम, ये बड़ा ही आम हो गया है! लकीरें दीवार बन गई हैं, बंटवारा आसान हो गया है! भक्ति खून की प्यासी है, श्रद्धा जिहाद हो गया है! मीट खाते बनाते मार डालो, नरभक्षी स्वाद हो गया है! वहशत, दहशत, सियासत, यूं राम का नाम हो गया है! चुप हैं सब धर्म के नाम से, गुनाह आसान हो गया है! "अल्ला ओ अकबर" किसी का, किसी का जय श्री राम हो गया है!

मैं भारत!

 मैं भारत हूं... टुकड़े टुकड़े, टूटता, बिखरता, बिलखता, आज-कल  अपनी पहचान खो, खोजता हूं, नफ़रत और दरिंदगी में, हिंदुत्व की गंदगी में, अयोध्या में घायल हूं, हरिद्वार में कातिल, किसानों की लाश हूं, भीमा-कोरेगांव का झूठ हूं, आर. एस. एस. की साजिश हूं, भीड़ का पागलपन भी में ही, मैं ही पड़ा लिखा वहशी हूं, मैं ही धर्म का तैशी हूं! सभ्यता की ऐसी तैसी हूं! दिल के, दिमाग के, सोच के, हमदिली के टुकड़े टुकड़े कर के सब एक हैं, कोई पहचान नहीं किसी की सब शामिल हैं, कोई जान कर,  कोई चुप मानकर, कोई मजबूर जानकर, गुस्से में, नफ़रत से, गले पर तलवार की धार, सर पर राम सवार, कराते जयजयकार, भगवान को प्यारे होते, कोई जी के, कोई मारे हुए, अपने अपने टुकड़ों में, सब एक ही भारत हैं, पर क्या एक हैं ?

टुकड़े टुकड़े भारत!

मैं टुकड़े टुकड़े हूं, मैं भारत हूं, किसी की आदत, कोई बगावत, किसी की शिकायत, किसी की नज़ाकत किसी को जमीन हूं, किसी की जानशीन, किसी को मोहब्बत हूं, किसी की हुज्जत हूं, दिन रात, देर-सबेर, मैं एक नहीं हूं, कभी था ही नहीं!

नफ़रत से प्यार!

चलो थोड़ी और नफ़रत करते हैं, खून में अपने ज़रा ज़हर भरते हैं, ज़िंदगी में सफल होने का ये प्रधान मंत्र है! शाह और मात के खेल में हिंसा शाषन तंत्र हैं! नफ़रत की गोदी में हिंसा पलती है, समय आने पर ज़हर उगलती है! नफ़रत काम आसान करती है, भीड़ को हिंदू मुसलमान करती है, जिसकी सरकार उसकी धौंस, लोकतंत्र बहुमत का खेल है, जो कम है वो फेल है! शाश्वत सत्य यही बात है, जो कम है वो उसका बुरा कर्म है, बुरे की हार है, यही हिंदुत्व व्यवहार है! चलो फिर दिल में नफ़रत जगाओ, हिंसा का अलख जगाओ, अगर अपनी नफ़रत पर तुम्हें शान है, तो यही सच्ची भक्ति की पहचान है! श्रेष्ठ कुल रीत सदा चली आई, नफ़रत ही ने जात चलाई, जो कम है वो अक्षम है! ढोर गंवार शुद्र पशु तन है! तिरस्कार इनका है जरूरी, बराबरी से रखो दूरी! भारत को हिंदू स्थान करो, धर्म नाम पर पाप करो, पापों का जो घड़ा भरे, धुल जाए सब गंग तरे! निर्भय हो तुम वीर बनो, नफ़रत के तुम तीर बनो! रीढ़ अपनी कर दो अर्पण, बुद्धि अपनी भेंट चढ़ाओ, मार किसी को अमर बन जाओ! रामराज में रम जाओ!

हिंदुत्वतन्त्र लोकभंग!

सच में अब ताकत नहीं है, ताकत में ही सब सच है! बोल रही खामोशी है, चीख़ रही बेहोशी है, जो चुप है वो आवाज़ है, ओ कुछ भी जो अलग अंदाज़ है! भीड़ जो है कानून बन गयी, पुलिस मेजबान बन गयी आम जगह बनी शमशान, धार्मिक लोकतंत्र की शान! अल्हा को अब राम बचाए? वेद पुराणों के दिन आए? अखंड भारत, महाभारत, मुर्दे की छाती पर कूदती, वानर सेना की महारथ!

मरता क्या न करता?

मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं, गधे नेता वोटों की घांस चर रहे हैं? मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं, सांसे कम पड़ रही हैं, और हस्पताल! मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं, चुल्लू काफ़ी फिर भी गंगा तर रहे हैं! मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं, भगवान बचाए, सो वो रास्ता कर रहे हैं! मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं, फिर भी लाखों सच से मुकर रहे हैं? सरकार निकम्मी है, नाकार और दुष्ट, मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं! इलाज के लिए दर दर भटक रहे हैं! मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं!! मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं, साहेब तस्वीर में फिर भी चमक रहे हैं!! मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं, भूखे, मजदूर, लाचार, दो मौत मर रहे हैं! देशभक्ति में सवाल न पूछने मजबूर हैं! मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं!! मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं, कोविड मरीज़ दाढ़ी जैसे बड़ रहे हैं! किसकी? दवा और दुआ दोनों ही मुकर रहे हैं! मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं!! मरते क्या न करते इसलिए मर रहे हैं, वोट आपके बड़ा कमाल कर रहे हैं?

हम सरकार!

टिकटोक पर बैन है! व्हाट्सएप से चैन है? पेटीएम फ़िर कैसा है? पीएम केयर में पैसा है? हाथ धोए पीछे पड़े खासे चिकने घड़े, खोखले भाषण सब, क्या कीजिएगा अब? मुफ़्त में राशन देंगे,                                                                                                                  योगा के आसन देंगे, झुठ आश्वासन देंगे, सवाल न होने देंगे! देश की सरकार है बात ये बेकार है, इंतज़ार करते मदद का, लाखों लाचार हैं! बात बढ-चढ कर बोलना, बीमारी मज़हब से तोल ना नफ़रत को भक्ति बोलना सत्ता के खेल हैं! सरपरस्त लकीर के फ़क़ीर हैं, कहाँ किसी के ज़मीर हैं, खून चूस मज़लूम का कामयाब सब अमीर हैं! ये कैसे हालात हैं,              ...

टूटती सच्चाईयाँ!

पैर ही छा ले बन गए हैं हवा के निवाले बन गए हैं, जुड़े हाथ प्या ले बने हैं अपने मुल्क के निकाले बने हैं! इस मुल्क में  सब कुछ चलता है! जैसे मजदूर हजार  मील ! घर बैठे  टीवी  पर देखने मिलता है! देश को  बेरहमी  से शमशान कर दिया! भुख और मौत  को मुसलमान  कर दिया! नफ़रत  या द्वेष  कहते हैं,  किसने  कहा देश  कहते हैं! नफ़रत है, द्वेष है,  भेड़िए भेड़ों के भेष  हैं, बाकी सब ठीक,  बड़ा  प्यारा अपना दे श है! कोई सर परस्त नहीं,  मुल्क को यतीम हम, दिलासे खो खले निक ले,  सारे यक़ीन कम! दूरियां बनाए रखना पुरानी परंपरा है, बीमार संस्कृति बड़ी काम आ रही है! बीमारी से मुक्ति मिली,  गरीबी से निज़ात,  जात, धर्म पूछें तो  और बिगड़ जाएगी बात!

कोरोनोलॉजी!

पहले क्या और बाद में क्या ये सच जान, इसको कहते क्रोनोलॉजी तड़ीपार ये ज्ञान! हस्पताल बुरे हाल में, नर्स डॉक्टर परेशान, आँख पे पर्दा डालने देते ताली/थाली ज्ञान! माथे पड़ती शिकन तो करोनॉलॉजी जान, डॉक्टर को थेँकु पहले और उस पे विज्ञान! पड़े लिखे बहक जाएं सुन के बात विज्ञानी, बिना सवाल मत मानो मूरख कब जानी? करत करत थाली को चोट, बापर होत निसान, अकल बड़ी के भैंस जा दे कोउ तुमको ज्ञान!! का दे कोउ गान, जो तुम कानन के कच्चे? लगे बघारन ज्ञान पड़ व्हाट्स के चिट्ठे!! व्हाट्सएप के गियान से अच्छे अच्छे घबराएं! न्यूटन, आइंस्टीन सुना कबर में लोट लगाएं!! कबर खुदी है ज्ञान की, अर्थी पर विज्ञान, सब शास्त्रन में लिखा है जो बोले सो मान! 

काम तमाम!

मर्ज़ी के अपनी बेईमान हो गए, आज से हम गुलाम हो गए! जमीन अभी भी अपनी ही है, ये क्या हुआ के मेहमान हो गए! सब कहते हैं कि जमहूरियत है, क्यों अपनी कह बदनाम हो गए? अपना कहा था सो आम हो गए अब सारे उनके वादे  हराम हो गए! वक्त के साथ नीयत बिगड़ती रही, उनकी जरूरत को क़त्लेआम हो गए! अगवा कर लिया सब अवाम  को गुनाह सारे सियासी काम हो गए! दो में बाँट दिया सरकारी फ़रमान ने, एक श्रीराम हुए, दूसरे 'हे राम' हो गए!

चाल चलन!

यूँ हालात है और नदारत सब सवाल है, कौन चल रहा है और किसकी चाल है? नज़र आता है और सबको मलाल है? "यही होता आया" किसकी मज़ाल है? सबको लगता है के उनका दिल साफ है! नज़र फेर ली है और अपना खून माफ़ है? ताकत सच है कमज़ोर का क्या हक़ है? पैदाइशी बराबरी ये भी एक कमाल है!! भक्ति धर्म है और चौतरफा कचरा कर्म है, चौखट पर सर है और कलयुग काल है? नफ़रत पल रही है ओ शिकारी शिकार हैं, गुस्सा सभी को है और ये भेड़चाल है!! देवघर एक धर्मस्थल श्रद्धालुओं के कचरे से लिप्त धर्मभक्ति, देशभक्ति आज दोनों बेलगाम हैं, गुंडों की टीम है और सियासत कप्तान है!! (देवघर, झारखंड में 10 दिन गुजारे, सवाल दिमाग में आये, वहां धार्मिक टूरिस्ट के फैलाए कचरे से, ये वही लोग हैं जो राम मंदिर चाहते हैं? वही लोग जो स्वच्छ भारत को तत्कालीन सरकार की उपलब्धि मानते हैं। वही लोग अपनी सोच और कर्म से भारत को प्रदूषित तो नहीं कर रहे?)

अरे बैन- छोड़ !

शानदार भारतीय परंपरा,  "त्याग" ,  सीधी भाषा में बोलें तो "छोड़ना" राम ने राज त्यागा, राम राज हो गया,  वनवास करने के बाद दोबारा राज छोड़ने में कोई एक्साइटमेंट नहीं था,  टी.आर.पी भी  नहीं मिलती,  रियलटी शो का नया सीज़न था सीता त्याग दी,  मर्द बन गये, वाह, मर्दाना पुरुषोतम,  खैर वो पुरानी कहानी है,  "हे राम"  अब सरकार ने जनता को भगवान बनाने की ठानी है,  एकदम फ़्रेश कहानी है, फ़ुलटू टी आर पी वाली अरनब कि कसम, आप सब जानते हैं, त्याग से भगवान बनते हैं,  राम हुए, बुद्ध हुए,  वो राजाओं का युग था,  राजा भगवान हो गये अब प्रज़ा का युग है,  तो प्रज़ा बनेगी,  (ये एपिसॊड़ लम्बी चलेगी ) पर कैसे,  त्याग तो सिखाना होगा छोड़ना,  अब एक एक को कहां समझाने जायें,  चलो बैन का रास्ता अपनायें  बैन जोड़   मतलब बेजोड़ आईड़िया है,  और सदियों से कहावत चली आ रही है,  एन आईड़िया केन बदलो दि दुनिया बीफ़ बैन - छोड़     खाने का त्याग, अब मुसलमान भगवान होंगे मीट...